General Insurance Council का बचाव: बुखार वाले मरीजों के एडमिशन पर नए नियम क्यों जरूरी?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
General Insurance Council का बचाव: बुखार वाले मरीजों के एडमिशन पर नए नियम क्यों जरूरी?

जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (GIC) ने बुखार और संक्रामक रोगों के मरीजों के एडमिशन को लेकर जारी की गई अपनी नई गाइडलाइंस का पुरजोर बचाव किया है। काउंसिल का मानना है कि अनावश्यक हॉस्पिटल एडमिशन को कम करके इंश्योरेंस क्लेम के बढ़ते बोझ को कंट्रोल करना जरूरी है। 2024-25 में हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम ₹94,247.6 करोड़ तक पहुंच गए थे।

क्यों लाए गए ये नियम?

जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (GIC) ने साफ किया है कि ये गाइडलाइंस इसलिए बनाई गई हैं ताकि ऐसे हॉस्पिटल एडमिशन पर लगाम लगाई जा सके जो शायद क्लिनिकल तौर पर जरूरी न हों। इसके साथ ही, बहुत ज्यादा जांचें कराना और लंबे समय तक हॉस्पिटल में रुकना, ये सब हेल्थकेयर की बढ़ती लागत के मुख्य कारण हैं। 2024-25 में कुल हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम ₹94,247.6 करोड़ रहे, जिसमें कैशलेस हॉस्पिटलाइजेशन का हिस्सा 66.4% था। GIC का मकसद इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे निकायों की गाइडलाइंस के आधार पर एक फ्रेमवर्क तैयार कर हेल्थ इंश्योरेंस को लंबे समय तक सभी के लिए किफायती बनाए रखना है।

डॉक्टर्स की आजादी और मरीज की सुरक्षा

मेडिकल समुदाय की चिंताओं को दूर करते हुए GIC ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह एडवाइजरी डॉक्टर्स की क्लिनिकल आजादी में दखल देने के लिए नहीं है। काउंसिल ने जोर देकर कहा कि यह फ्रेमवर्क डॉक्टर के फैसले से ऊपर नहीं है। अगर कोई डॉक्टर यह तय करता है कि दी गई गाइडलाइंस से हटकर भी एडमिशन जरूरी है, तो वे उचित क्लिनिकल कारण और डॉक्यूमेंटेशन देकर ऐसा कर सकते हैं। मरीजों के नजरिए से, GIC का कहना है कि इस पहल से अनावश्यक हॉस्पिटल स्टे से बचा जा सकेगा, जिससे मरीजों को हॉस्पिटल में होने वाले इन्फेक्शन और ज्यादा दवाइयों के साइड इफेक्ट्स जैसे रिस्क से भी बचाया जा सकेगा।

इंश्योरेंस सेक्टर पर भविष्य का असर

GIC ने इन गाइडलाइंस को एक 'लिविंग फ्रेमवर्क' बताया है, जिसका मतलब है कि क्लिनिकल मानकों में बदलाव और हॉस्पिटल एसोसिएशन्स से मिलने वाले फीडबैक के आधार पर इनमें समायोजन किया जाएगा। इंश्योरेंस इंडस्ट्री के लिए इन गाइडलाइंस का सफल कार्यान्वयन बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्लेम की बढ़ी हुई लागत सीधे तौर पर लॉस रेशियो को प्रभावित करती है और अंततः ग्राहकों के लिए प्रीमियम की कीमतों पर असर डालती है। जैसे-जैसे यह सेक्टर बढ़ रहा है, सुलभ स्वास्थ्य सेवा और टिकाऊ वित्तीय प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखना एक प्रमुख फोकस बना हुआ है। इस रोलआउट के अगले चरण में इंश्योरर्स, हॉस्पिटल्स और मेडिकल बोर्ड्स के बीच लगातार बातचीत जारी रहने की संभावना है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ये मानक इंडस्ट्री में समान रूप से लागू हों। इन्वेस्टर्स क्लेम सेटलमेंट के रुझानों और प्रमुख हेल्थ इंश्योरेंस प्रोवाइडर्स की प्रॉफिटेबिलिटी पर इन लागत-नियंत्रण उपायों के प्रभाव पर नजर रखेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.