2026 में मेडिकल महंगाई **14%** की रफ्तार से बढ़ रही है, जो भारत के **2.68 करोड़** दिव्यांगजनों के परिवारों के लिए एक बड़ी चुनौती है। निरामया (Niramaya) जैसी सरकारी योजनाओं और प्राइवेट इंश्योरेंस राइडर्स के बीच सही संतुलन बनाना अब आपकी फाइनेंशियल सिक्योरिटी के लिए अनिवार्य हो गया है।
भारत में मेडिकल खर्चों का बढ़ना आम परिवारों की बचत पर सीधा असर डाल रहा है। 2026 तक मेडिकल इन्फ्लेशन के 14% तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे दिव्यांगजनों (PwDs) के परिवारों पर वित्तीय बोझ बढ़ा है।
सरकारी स्कीम्स और प्राइवेट विकल्प
भारत में दिव्यांगजनों के लिए सुरक्षा के मुख्य रूप से दो स्तर हैं। सरकारी स्तर पर 'निरामया हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम' (Niramaya Health Insurance Scheme) है, जिसे नेशनल ट्रस्ट मैनेज करता है। यह योजना विकास संबंधी और मल्टीपल डिसेबिलिटी वाले लोगों को सालाना ₹1 लाख तक का कवरेज देती है। वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 'आयुष्मान भारत PM-JAY' के तहत ₹5 लाख तक का कवर मिलता है, जो आपातकालीन स्थितियों में बड़ा सहारा है।
प्राइवेट सेक्टर की बात करें, तो यहां स्टैंडअलोन लॉन्ग-टर्म डिसेबिलिटी इंश्योरेंस के बजाय अक्सर स्टैंडर्ड हेल्थ पॉलिसी के साथ 'राइडर्स' (Riders) या पर्सनल एक्सीडेंट कवर दिए जाते हैं। हालांकि, ये रोबोटिक सर्जरी जैसी एडवांस मेडिकल सुविधाओं को कवर करते हैं, लेकिन इनके प्रीमियम महंगे होने की वजह से आम आदमी की पहुंच से बाहर हो सकते हैं।
रिस्क और चुनौतियां
IRDAI ने उम्र की सीमा हटाकर सुधार किए हैं, लेकिन अभी भी एक बड़ा 'प्रोटेक्शन गैप' मौजूद है। अधिकतर प्राइवेट पॉलिसी में 24 से 36 महीने का वेटिंग पीरियड होता है और वैलिड डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट होना अनिवार्य है। कई बार इलाज का खर्च पहले जेब से करना पड़ता है, जो क्राइसिस के समय कैश की तंगी पैदा कर सकता है।
परिवारों के लिए जरूरी टिप्स
आर्थिक सुरक्षा के लिए तीन बातें ध्यान रखें:
- अपडेटेड डॉक्यूमेंट्स: मेडिकल रिकॉर्ड और डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट्स हमेशा अपडेट रखें।
- पॉलिसी की बारीकियां: कवरेज और प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन के वेटिंग पीरियड को ध्यान से समझें।
- पर्याप्त सुरक्षा: मेडिकल महंगाई को देखते हुए समय-समय पर अपने इंश्योरेंस कवर का रिव्यु करें और सरकारी-प्राइवेट योजनाओं का सही तालमेल बनाएं।
