भारत में कंपनियां अब इंश्योरेंस के साथ प्रीवेंटिव हेल्थकेयर को जोड़ रही हैं, जिसका असर सीधा मुनाफे पर दिख रहा है। क्रॉनिक बीमारियों के क्लेम में **13%** की कमी आई है और प्रति कर्मचारी **₹480** की बचत हो रही है।
कॉर्पोरेट इंडिया अब कर्मचारियों के हेल्थ इंश्योरेंस को देखने के नजरिए में बड़ा बदलाव ला रहा है। इंश्योरेंस टेक्नोलॉजी फर्म Plum की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, जो कंपनियां अपने ट्रेडिशनल इंश्योरेंस के साथ मेंटल हेल्थ सपोर्ट, टेलीहेल्थ और वेलनेस प्रोग्राम्स को जोड़ रही हैं, उन्होंने क्रॉनिक बीमारियों के क्लेम में 13% की बड़ी गिरावट दर्ज की है।
तेजी से बदल रहा ट्रेंड
6,000 से ज्यादा कंपनियों के डेटा से पता चलता है कि अब 23% कंपनियां वेलनेस-इंटीग्रेटेड मॉडल अपना रही हैं, जो 2023 के फाइनेंशियल ईयर में सिर्फ 5% था। इस बदलाव से कंपनियों को रिन्यूअल के दौरान प्रति कर्मचारी लगभग ₹480 तक की बचत हो रही है।
इंश्योरेंस कंपनियों के लिए क्या मायने हैं?
ICICI Lombard, Star Health और HDFC Life जैसी बड़ी इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह ट्रेंड काफी अहम है। छोटे और क्रॉनिक क्लेम्स की संख्या कम होने से इंश्योरेंस कंपनियों के लॉस रेशियो (Loss Ratio) में सुधार हो रहा है, जो उनकी अंडरराइटिंग प्रॉफिटेबिलिटी को सहारा दे रहा है।
बड़ी चुनौतियां अभी बाकी हैं
हालांकि, कैंसर और हृदय रोगों जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज का खर्च 2.5 से 3.5 गुना तक बढ़ गया है। प्रीवेंटिव केयर से छोटे क्लेम्स तो कम हो रहे हैं, लेकिन गंभीर बीमारियों का बढ़ता खर्च इंश्योरेंस कंपनियों के लिए अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
बढ़ता हुआ कवरेज
कंपनियां न केवल बचाव पर ध्यान दे रही हैं, बल्कि बेनिफिट्स भी बढ़ा रही हैं। अब 53% ज्यादा कंपनियां अपने कर्मचारियों को ₹5 लाख से ज्यादा का सम इंश्योर्ड दे रही हैं, और मैटरनिटी बेनिफिट्स के मामले में ₹75,000 से ऊपर का कवर देने वाली कंपनियों में 155% का इजाफा हुआ है।
