बहुत से कार मालिक यह गलती करते हैं कि उनकी पूरी कॉम्प्रिहेंसिव (Comprehensive) इंश्योरेंस पॉलिसी 3 साल के लिए है। जबकि सच यह है कि थर्ड-पार्टी कवर तो लंबे समय के लिए होता है, लेकिन 'ओन-डैमेज' (Own-Damage) कवर सालाना होता है जिसे हर साल रिन्यू कराना जरूरी है। इसे मिस करने पर गाड़ी के रिपेयर का खर्च आपको खुद उठाना पड़ सकता है।
भारत में कार इंश्योरेंस की वैलिडिटी को लेकर काफी कन्फ्यूजन है, जो कई कार मालिकों के लिए एक बड़ी फाइनेंशियल मुसीबत बन सकता है। नई कार खरीदते समय ग्राहकों को अक्सर एक बंडल इंश्योरेंस पैकेज दिया जाता है, जिसमें थर्ड-पार्टी और ओन-डैमेज दोनों शामिल होते हैं। इसी वजह से लोगों को लगता है कि पूरी पॉलिसी 3 साल के लिए है, लेकिन हकीकत में ओन-डैमेज का हिस्सा हर 12 महीने में रिन्यू कराना अनिवार्य है।
इंश्योरेंस के दो हिस्से
भारतीय मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी दो भागों में बंटी होती है। पहला है 'थर्ड-पार्टी लायबिलिटी', जो Motor Vehicles Act, 1988 के तहत अनिवार्य है और दूसरों को हुए नुकसान की भरपाई करता है। सितंबर 2026 तक के नियमों के अनुसार, नई गाड़ियों पर यह 3 साल का कवर अनिवार्य है। वहीं, अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने नई कारों के लिए इसे 4 साल और दोपहिया वाहनों के लिए 6 साल करने का प्रस्ताव दिया है, जिससे तारीखों का गणित और भी जटिल हो गया है।
कवरेज लैप्स होने का खतरा
भले ही थर्ड-पार्टी कवर कानूनी रूप से लंबा हो, लेकिन 'ओन-डैमेज' कवर—जो एक्सीडेंट, चोरी या नेचुरल डिजास्टर में आपकी गाड़ी की मरम्मत का खर्च उठाता है—वह सालाना ही होता है। यदि आप इसे रिन्यू नहीं कराते, तो आपकी गाड़ी का सुरक्षा कवच खत्म हो जाता है।
इसके अलावा, पॉलिसी लैप्स होने से आपको 'नो क्लेम बोनस' (No Claim Bonus) का फायदा भी नहीं मिलता। 90 दिनों की ग्रेस पीरियड के बाद पॉलिसी दोबारा लेने पर इंश्योरेंस कंपनियां अक्सर गाड़ी का फिजिकल इंस्पेक्शन करती हैं, जिससे प्रीमियम भी बढ़ सकता है और काफी समय भी बर्बाद होता है।
डीलर के भरोसे न रहें
कई मालिक डीलर की मौखिक बातों पर भरोसा कर लेते हैं, जो बाद में रिन्यूअल की याद दिलाने में चूक सकते हैं। अपनी पॉलिसी के डॉक्यूमेंट्स को खुद चेक करें और एक्सपायरी डेट को नोट करें। सालाना रिन्यूअल को ट्रैक करना ही आपकी गाड़ी को सुरक्षित रखने और अनचाहे खर्चों से बचने का एकमात्र तरीका है।
