ज्यादातर हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में 'रीस्टोरेशन' या 'रीफिल' की सुविधा होती है, लेकिन इसके पीछे छिपी शर्तें आपको इमरजेंसी में भारी मुसीबत में डाल सकती हैं।
हेल्थ इंश्योरेंस में 'रीस्टोरेशन' या 'रीफिल' का फीचर आजकल खूब चर्चा में रहता है। यह तब काम आता है जब आपका शुरुआती सम इंश्योर्ड (Sum Insured) खत्म हो जाता है। सुनने में यह एक बेहतरीन सुरक्षा कवच लगता है, लेकिन इसे पर्याप्त बेस कवर का विकल्प समझना आपकी बड़ी भूल हो सकती है। पॉलिसी लेने या रिन्यू करने से पहले इसकी बारीक शर्तें जरूर समझ लें।
रीस्टोरेशन का ट्रिगर (Trigger Point)
सबसे बड़ा कन्फ्यूजन इस बात पर होता है कि यह फीचर काम कब करता है। कुछ कंपनियों की पॉलिसी में पूरा बेस कवर खत्म होने के बाद ही रीस्टोरेशन शुरू होता है। अगर आपकी पॉलिसी में 100% एग्जॉशन की शर्त है, तो आप बीच के खर्चों के लिए कवरेज से बाहर हो सकते हैं। इसलिए यह साफ कर लें कि रीस्टोरेशन पूरे बेस कवर के इस्तेमाल के बाद मिलेगा या आंशिक (partial) इस्तेमाल पर।
एक ही बीमारी पर पाबंदी
पॉलिसी की सबसे कठिन शर्त होती है—'सेम इलनेस क्लॉज'। कई बार कंपनियां कहती हैं कि रीस्टोर हुआ पैसा उसी बीमारी के लिए खर्च नहीं किया जा सकता, जिसके लिए आपने पहला क्लेम लिया था। अगर कैंसर या हार्ट जैसी बीमारी के लिए साल में कई बार अस्पताल जाना पड़े, तो यह बेनिफिट आपके लिए बेकार साबित हो सकता है।
बेस कवर से समझौता न करें
मार्केटिंग के जाल में फंसकर छोटे बेस कवर के साथ 'अनलिमिटेड रीस्टोरेशन' लेना एक रिस्की फैसला हो सकता है। रीस्टोरेशन महज एक सेकेंडरी सपोर्ट है। अगर कोई बड़ी इमरजेंसी आती है, तो रीस्टोरेशन की शर्तें आपके क्लेम को खारिज कर सकती हैं। हमेशा अपने बेस कवर को प्राथमिकता दें।
छिपी हुई शर्तें और एक्सक्लूजन
कई पॉलिसियों में रीस्टोर हुआ पैसा सिर्फ इनपेशेंट हॉस्पिटल खर्चों तक सीमित होता है। इसका मतलब है कि प्री और पोस्ट-हॉस्पिटलाइजेशन का खर्च आपको खुद उठाना पड़ सकता है। अपनी पॉलिसी के फाइन प्रिंट को ध्यान से पढ़ें, क्योंकि यही वे छोटे पॉइंट्स हैं जो जरूरत के समय आपकी जेब पर भारी पड़ सकते हैं।
