भारत के डिफेंस और स्पेस-टेक स्टार्टअप्स अब बड़े शहरों से निकलकर छोटे शहरों (Tier-II और Tier-III) की ओर रुख कर रहे हैं। इसकी वजह है सस्ती ज़मीन, खुला आसमान और सरकारी नीतियां। इससे कंपनियों को लागत कम करने में मदद मिल रही है, लेकिन सप्लाई चेन और टैलेंट को मैनेज करना एक चुनौती है।
क्या हो रहा है?
भारत के डिफेंस और स्पेस-टेक स्टार्टअप्स में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। जो कंपनियां पहले बेंगलुरु, दिल्ली-NCR और मुंबई जैसे बड़े शहरों में केंद्रित थीं, वे अब छोटे शहरों में अपनी मैन्युफैक्चरिंग, टेस्टिंग और ट्रेनिंग की सुविधाएं लगा रही हैं। यह बड़े पैमाने पर सॉफ्टवेयर से हटकर हार्डवेयर पर फोकस करने का संकेत है, जहां फिजिकल स्पेस और टेस्टिंग के लिए खुला आसमान एक बड़ी ज़रूरत बन गया है।
इसका एक बड़ा उदाहरण BonV Aero है, जिसने ओडिशा के खुर्दा में 300 करोड़ रुपये का ड्रोन पार्क खोला है। यह 30 एकड़ से ज़्यादा फैली जगह असेंबली लाइन, रिसर्च सेंटर और टेस्टिंग ज़ोन के लिए है। इसी तरह, कई और कंपनियां उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे इलाकों में टेस्टिंग सेंटर बना रही हैं ताकि ज़्यादा आबादी वाले शहरों में मना किए जाने वाले संवेदनशील प्रोपल्शन टेस्ट और बड़े ड्रोन ऑपरेशन किए जा सकें।
निवेशकों के लिए क्यों ज़रूरी?
निवेशकों के लिए यह बदलाव बिजनेस मॉडल के परिपक्व होने का संकेत है। ड्रोन और स्पेस-टेक बूम की शुरुआत में, स्टार्टअप्स अक्सर शहरों के अंदर ही सॉफ्टवेयर या छोटे-मोटे असेंबली पर ध्यान देते थे। अब जैसे-जैसे ये कंपनियां बड़ी हो रही हैं, उन्हें 'फील्ड-रेडी' मैन्युफैक्चरिंग की ज़रूरत पड़ रही है। छोटे शहरों में सेटअप लगाना सिर्फ़ लागत बचाने का तरीका नहीं, बल्कि एक ऑपरेशनल ज़रूरत है।
हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग में काफी पैसा लगता है। छोटे शहरों में जाकर, ये स्टार्टअप्स अपनी फिक्स्ड कॉस्ट, जैसे ज़मीन और लेबर का खर्च, कम कर सकते हैं और उस पैसे को R&D और इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने में लगा सकते हैं। साथ ही, खास 'टेस्टिंग कॉरिडोर' की सुविधा मिलने से ये कंपनियां 'बिना नज़र आए' (Beyond Visual Line of Sight - BVLOS) ऑपरेशन कर सकती हैं, जो ऑटोनोमस सिस्टम की टेस्टिंग के लिए बहुत ज़रूरी है और शहरों के एयरस्पेस में संभव नहीं है।
रणनीतिक फायदे और नुकसान
छोटे शहरों में जाने के फायदे तो हैं, लेकिन कुछ नए ऑपरेशनल जोखिम भी हैं जिन पर निवेशकों को नज़र रखनी चाहिए:
इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी: बड़े शहरों के मुकाबले, छोटे शहरों में हाई-स्पीड इंटरनेट, भरोसेमंद बिजली और ख़ास पुर्जों की ट्रांसपोर्ट लॉजिस्टिक्स में दिक्कतें आ सकती हैं। हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग 'जस्ट-इन-टाइम' सप्लाई चेन पर निर्भर करती है। अगर किसी स्टार्टअप को बड़े सप्लायर क्लस्टर से दूर होने की वजह से हाई-टेक कंपोनेंट्स आसानी से नहीं मिल पाते, तो प्रोडक्शन में देरी हो सकती है।
टैलेंट की कमी: डिफेंस और स्पेस-टेक के लिए बहुत खास इंजीनियरिंग टैलेंट की ज़रूरत होती है। भले ही ये स्टार्टअप्स स्किलिंग सेंटर खोलकर लोकल जॉब्स बना रहे हों, फिर भी उन्हें अक्सर बड़े शहरों से सीनियर टेक्निकल एक्सपर्ट्स को बुलाना पड़ता है। छोटे शहरों में ऐसे टैलेंट को बनाए रखना एक लंबी चुनौती हो सकती है।
फंडिंग और इकोसिस्टम: भारत में वेंचर कैपिटल और एंजेल इन्वेस्टमेंट ज़्यादातर कुछ बड़े शहरों में ही केंद्रित रहा है। हालांकि iDEX (Innovations for Defence Excellence) जैसी सरकारी स्कीमें और राज्य-स्तरीय नीतियां काफी मदद कर रही हैं, लेकिन मुख्य हब से बाहर काम करने वाले स्टार्टअप्स को प्राइवेट इन्वेस्टमेंट कम्युनिटी से जुड़ने में ज़्यादा मुश्किलें आ सकती हैं।
बड़ा बिज़नेस संदर्भ
यह बदलाव 'आत्मनिर्भर भारत' जैसी राष्ट्रीय नीतियों और राज्यों की एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग नीतियों का बड़ा सहारा ले रहा है। राज्य सरकारें ज़मीन, इंफ्रास्ट्रक्चर और आसान रेगुलेटरी सपोर्ट देकर इन स्टार्टअप्स को आकर्षित करने की कोशिश कर रही हैं। निवेशकों के लिए, यह एक 'पॉलिसी टेलविंड' (सरकारी समर्थन) है जो बड़े मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के शुरुआती जोखिम को कम करता है।
हालांकि, इन कंपनियों की असली सफलता सिर्फ़ लोकेशन पर निर्भर नहीं करेगी। मुख्य बातों पर नज़र रखनी होगी: बड़े पैमाने पर जटिल मैन्युफैक्चरिंग को लागू करने की क्षमता, लंबे समय तक सरकारी या कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करना, और भारी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करते हुए एक स्वस्थ बैलेंस शीट बनाए रखना। छोटे शहरों में जाना बड़े पैमाने का संकेत है, लेकिन इसे मजबूत ऑपरेशनल मैनेजमेंट का साथ मिलना चाहिए।
निवेशक क्या देखें?
निवेशक प्रोजेक्ट के एग्जीक्यूशन टाइमलाइन पर अपडेट देख सकते हैं और यह जान सकते हैं कि क्या ये नई सुविधाएं तय उत्पादन क्षमता तक पहुंच रही हैं। एक और ज़रूरी क्षेत्र है लोकल सप्लाई चेन का विकास। क्या स्टार्टअप पार्ट्स के लिए लोकल MSMEs पर निर्भर है, या वे अभी भी इंपोर्टेड या दूर के सप्लायर्स पर निर्भर हैं? आखिर में, टेस्टिंग कॉरिडोर के लिए रेगुलेटरी क्लीयरेंस पर नज़र रखें, क्योंकि ये नई टेक्नोलॉजी को वेरिफाई करने और प्रोडक्ट्स को 'प्रोटोटाइप' से 'रेवेन्यू' तक ले जाने के लिए बहुत ज़रूरी हैं।
