जूट मिलों पर तालेबंदी का खतरा, दाम ₹17,100 पार!
पश्चिम बंगाल की जूट मिलें एक गंभीर संकट से जूझ रही हैं, जिसके चलते बड़े पैमाने पर मिलें बंद होने की नौबत आ गई है। कच्चे जूट की सप्लाई में आई भारी रुकावट और कीमतों में बेतहाशा उछाल ने इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी है। सरकारी नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं और नई राज्य सरकार पर इंडस्ट्री को बचाने का भारी दबाव आ गया है।
कीमतों का अंबार और सप्लाई में फ्रीज
सूत्रों के मुताबिक, कच्चे जूट की कीमतें 1 जनवरी 2026 को ₹11,600 प्रति क्विंटल थीं, जो 6 मई 2026 तक बढ़कर ₹17,100 प्रति क्विंटल तक पहुंच गईं। यह दाम सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹5,650 से कहीं ज्यादा है। हालात तब और बिगड़े जब जूट कमिश्नर ऑफिस (JCO) ने 5 मई 2026 को ट्रेडर्स के लिए 'जीरो-स्टॉक' पॉलिसी का आदेश दिया, जिसका मकसद सप्लाई बढ़ाना था। लेकिन इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस कदम ने मार्केट ऑपरेशंस को ठप्प कर दिया। जूट बॉलर्स एसोसिएशन (JBA) ने 7 मई 2026 को अपने बेंचमार्क कोट्स प्रकाशित करना बंद कर दिया, क्योंकि JCO ने ट्रेड पर बैन लगा दिया था। इससे खरीद लागत और सप्लाई को लेकर भारी अनिश्चितता छा गई है।
फिलहाल TD-5 ग्रेड जूट का मार्केट रेट करीब ₹11,300 प्रति क्विंटल चल रहा है, जो कि अगस्त 2024 में देखे गए ₹5,150 प्रति क्विंटल से काफी ज्यादा है। JBA ने दिसंबर 2025 में TD-4 और TD-5 के लिए ₹12,100 और ₹11,600 प्रति 100 किलोग्राम की दरें बताई थीं। हुगली इंडस्ट्रियल बेल्ट में कम से कम 14 मिलों ने अपना प्रोडक्शन रोक दिया है या गंभीर प्रोडक्शन दिक्कतों का सामना कर रही हैं। इससे करीब 75,000 वर्कर्स की नौकरियां दांव पर लग गई हैं।
ऐतिहासिक चुनौतियां और मार्केट की चाल
पश्चिम बंगाल के जूट इंडस्ट्री का इतिहास साइक्लिकल संकटों से भरा रहा है। 1947 के बंटवारे के बाद भारत की मिलों को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से कच्चा जूट मिलना बंद हो गया था। इससे पहले, कच्चे जूट पर ₹6,500 प्रति क्विंटल की सरकारी कीमत सीमा को मई 2022 में करीब दर्जन भर मिलों के बंद होने के बाद हटा दिया गया था। यह इतिहास बताता है कि प्राइस कंट्रोल अनजाने में सप्लाई और प्रोडक्शन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
ग्लोबल जूट मार्केट के 2035 तक USD 5.2 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें भारत एक प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता है, जो बांग्लादेश और सिंथेटिक मैटेरियल्स से प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। एशिया-पैसिफिक इस मार्केट पर हावी है। फूड ग्रेंस और शुगर पैकेजिंग के लिए जूट बैग के अनिवार्य उपयोग जैसी सरकारी नीतियां कुछ बेसिक डिमांड सुनिश्चित करती हैं। हालांकि, मौजूदा संकट दिखाता है कि ये मैंडेट्स कच्चे माल की स्थिर सप्लाई या प्रॉफिटेबल ऑपरेशंस सुनिश्चित करने के लिए काफी नहीं हैं, खासकर जब इनपुट कॉस्ट तेजी से बढ़ती है।
संकट की जड़: रेगुलेटरी एक्शन और मार्केट की दिक्कतें
इंडस्ट्री के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि मौजूदा संकट सिर्फ सीजनल शॉर्टेज की वजह से नहीं है, बल्कि 'लंबे समय से जमाखोरी (hoarding), मार्केट की बिगड़ी हुई स्थिति और निष्क्रियता' का नतीजा है। इससे पता चलता है कि कुछ मार्केट प्लेयर्स ने सप्लाई को कॉर्नर कर लिया है, जिससे फैक्ट्रियों के लिए कीमतें बहुत ज्यादा हो गई हैं। जूट कमिश्नर का 'जीरो-स्टॉक' ऑर्डर और ट्रेड बैन, जो कच्चे जूट की उपलब्धता बढ़ाने के लिए था, उसने उल्टा मार्केट को लकवाग्रस्त कर दिया है और अनिश्चितता बढ़ा दी है। यह दिखाता है कि रेगुलेटरी एक्शन प्राइस डिस्कवरी और ट्रेड को कैसे बाधित कर सकते हैं।
मिल मालिक रिपोर्ट कर रहे हैं कि जूट बैग के लिए सरकार द्वारा तय की गई कीमतें कच्चे जूट की लागत वृद्धि से मेल नहीं खा रही हैं, जिससे अनसस्टेनेबल प्रॉफिट मार्जिन और कैश फ्लो का दबाव बढ़ रहा है। कच्चे माल की लागत और रेगुलेटेड सेलिंग प्राइस के बीच का अंतर एक बड़ी कमजोरी पैदा करता है। जूट वर्ष 1 जुलाई से शुरू होने वाला है और नई फसलें जुलाई के अंत में आने की उम्मीद है, जिससे सप्लाई की बड़ी कमी का अनुमान है। अगर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई तो और मिलें बंद हो सकती हैं।
इंडस्ट्री की सरकार से तत्काल मांग
जूट मिल मालिक नव-निर्वाचित बीजेपी सरकार और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से त्वरित कार्रवाई की अपील कर रहे हैं। वे जमा किए गए जूट की तत्काल रिहाई, इमरजेंसी इंपोर्ट (खासकर बांग्लादेश से) की अनुमति और एक कारगर प्राइस रेंज की बहाली की मांग कर रहे हैं। इंडस्ट्री को उम्मीद है कि नई सरकार बीजेपी के पारंपरिक उद्योगों को पुनर्जीवित करने के वादे के अनुरूप एक अधिक प्रतिक्रियाशील नीति वातावरण बनाएगी।