इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर लागत का भारी बोझ
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर इस समय बढ़ती लागत के दबाव से जूझ रहा है। कंपनियों के लिए एक्सपोर्ट लीड टाइम (Export Lead Time) 45 दिनों से बढ़कर 70 दिनों तक पहुंच गया है, जिससे उन्हें ज्यादा इन्वेंटरी (Inventory) रखनी पड़ रही है। इस लॉजिस्टिक (Logistics) चुनौती को रुपये के कमजोर होने ने और बढ़ा दिया है, जिससे निर्माताओं पर वित्तीय बोझ बढ़ा है।
कंपोनेंट्स की कीमतों में उछाल
उत्पादन के हर स्तर पर कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। चिपसेट (Chipsets), जो कि एक मुख्य कंपोनेंट है, की कीमतें पहले ही 15% से 20% तक बढ़ चुकी हैं। ग्रीस (Grease) और पैकेजिंग (Packaging) जैसी बुनियादी चीजों के दाम 45% तक चढ़ गए हैं। केमिकल (Chemical) और रेजिन (Resin) सेगमेंट तो और भी ज्यादा अस्थिर हैं, जहां ऑर्गेनिक केमिकल्स (Organic Chemicals) और हार्डनर्स (Hardeners) की सप्लाई तो है, लेकिन कीमतें 40% से 70% तक बढ़ गई हैं।
जरूरी मटेरियल हुए महंगे
इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण के लिए जरूरी कुछ प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। एपॉक्सी रेजिन (Epoxy Resins) की कीमत ₹300 प्रति किलोग्राम से बढ़कर ₹400 प्रति किलोग्राम हो गई है। प्लास्टिक रेजिन (Plastic Resins) और हीलियम (Helium) जैसे जरूरी इनपुट्स (Inputs) की लागत दोगुनी हो गई है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग बजट पर भारी असर पड़ रहा है।
इंडस्ट्री ने सरकार से मांगी टैक्स में राहत
इन बढ़ती लागतों से निपटने के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग ने सरकार से दखल देने की गुहार लगाई है। निर्माता प्लास्टिक मटेरियल (Plastic Materials), लिक्विफाइड नेचुरल गैस (Liquefied Natural Gas) और कुछ अहम धातुओं जैसे महत्वपूर्ण इनपुट्स पर जीरो-ड्यूटी (Zero-Duty) व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं। उनका कहना है कि कमजोर रुपया और बढ़ती ओवरहेड्स (Overheads) के संयुक्त प्रभाव को कम करने के लिए यह टैक्स राहत (Tax Relief) बहुत जरूरी है।
उपभोक्ताओं को लग सकता है महंगाई का झटका
हालांकि, उद्योग का यह भी कहना है कि अगर लागत इसी तरह बढ़ती रही, तो अंततः इसका बोझ आम उपभोक्ता पर पड़ेगा। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स की खुदरा कीमतें बढ़ने की संभावना है, जो घरेलू बजट को प्रभावित करेगा।