NCLAT में वैल्यूएशन पर छिड़ी जंग
NCLAT में जे.पी. एसोसिएट्स (JAL) के अधिग्रहण की लड़ाई और तेज हो गई है। Vedanta ने Adani Enterprises की जीती हुई बोली (bid award) को चुनौती दी है। Vedanta का दावा है कि उसकी वित्तीय पेशकश (financial offer) कहीं ज़्यादा बेहतर थी, औरvaluation प्रक्रिया में निष्पक्षता (fairness) नहीं बरती गई। वहीं, JAL के Resolution Professional (RP) ने NCLAT को बताया कि Vedanta को कभी भी सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित नहीं किया गया था। RP ने कहा कि कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) ने एक विस्तृत मूल्यांकन प्रणाली (evaluation framework) का इस्तेमाल किया, जो वित्तीय बोलियों के साथ-साथ दूसरे महत्वपूर्ण पहलुओं को भी ध्यान में रखती है।
Vedanta का दावा, CoC की मैट्रिक्स
Vedanta का कहना है कि उसने एक ऐडेंडम बिड (addendum bid) में Adani की बोली से लगभग ₹3,400 करोड़ ज़्यादा ग्रॉस वैल्यू (gross value) और ₹500 करोड़ ज़्यादा नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) की पेशकश की थी। Vedanta के मुताबिक, इससे यह साबित होता है कि CoC ने इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के मुख्य लक्ष्य, यानी वैल्यू को अधिकतम (maximize value) नहीं किया। RP ने यह भी स्पष्ट किया कि 5 सितंबर, 2025 को भेजा गया एक ईमेल सिर्फ सबसे बड़े वित्तीय आंकड़े (₹12,505.850 करोड़ NAV) की जानकारी देने के लिए था, न कि किसी आधिकारिक घोषणा के तौर पर। RP की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि CoC ने 100-पॉइंट सिस्टम का इस्तेमाल किया, जिसमें 80 पॉइंट वित्तीय आंकड़ों (financial figures) के लिए और 20 पॉइंट गुणात्मक पहलुओं (qualitative aspects) के लिए रखे गए थे। यह इंसॉल्वेंसी मामलों में एक आम तरीका है।
बोली संशोधन (Bid Revisions) पर सवाल
Vedanta की स्थिति एक और वजह से जटिल हो गई। 8 नवंबर, 2025 को, यानी वोटिंग शुरू होने की सूचना मिलने के एक दिन बाद, Vedanta ने अपनी बोली को संशोधित (revised bid) करके जमा किया। RP ने इसे एक "अस्वीकार्य एकतरफा संशोधन" (impermissible unilateral revision) करार दिया। उनका कहना है कि इसने निष्पक्षता के नियमों का उल्लंघन किया और अन्य सभी आवेदकों को मिले समान अवसर को खत्म कर दिया, जिससे प्रक्रिया की अंतिम पवित्रता (finality) भंग हुई। इससे पहले, Vedanta की NCLT, इलाहाबाद में की गई अर्ज़ी, जिसने Adani की ₹14,535-करोड़ की बोली को मंजूरी दी थी, खारिज कर दी गई थी। NCLAT और सुप्रीम कोर्ट ने भी Vedanta की अंतरिम स्टे (interim stays) की कोशिशों को ठुकरा दिया था।
Adani और Vedanta के वित्तीय आंकड़े
वित्तीय आंकड़ों (Financial figures) की बात करें तो, FY25 में Adani Group ने लगभग ₹90,000 करोड़ का EBITDA दर्ज किया, वहीं Adani Enterprises ने 31 मार्च, 2025 को समाप्त हुए साल के लिए ₹16,722 करोड़ का मुनाफा कमाया। Adani Group का नेट डेट टू EBITDA रेश्यो (Net Debt to EBITDA ratio) 2.6x रहा। Vedanta Limited ने FY25 के लिए $1,617 मिलियन का मुनाफा पोस्ट किया और रेवेन्यू (revenue) 6% बढ़कर $18.2 बिलियन हो गया। Q2 FY25 के लिए Vedanta ने ₹39,218 करोड़ का रेवेन्यू और ₹11,612 करोड़ का EBITDA बताया, जिसमें नेट डेट टू EBITDA रेश्यो 1.37x था। विश्लेषकों (Analysts) का Vedanta पर आम तौर पर सकारात्मक रुख है, कई 'Buy' रेटिंग दे रहे हैं और प्राइस टारगेट बढ़ा रहे हैं। कुछ बाजार पर्यवेक्षकों (market watchers) का मानना है कि Adani Enterprises में गिरावट का रुख है, हालांकि Jefferies ने स्टॉक को 'Buy' रेट किया है। JAL की अनुमानित लिक्विडेशन वैल्यू (estimated liquidation value) लगभग ₹15,799.53 करोड़ थी। Adani की स्वीकृत बोली ₹14,535 करोड़ थी, जिसका मतलब है कि अगर JAL को लिक्विडेट किया जाता तो लेनदारों (creditors) को ज़्यादा पैसे मिलते, यह बात Vedanta अपने बेहतर ऑफर के दावे के समर्थन में उठा रही है।
इंसॉल्वेंसी कानून और भविष्य की मिसालें
यह विवाद IBC के कामकाज पर सवाल उठाता है, खासकर कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) की "कमर्शियल विजडम" (commercial wisdom) पर। हालांकि CoC के फैसले आमतौर पर अंतिम माने जाते हैं, Vedanta यह सवाल कर रही है कि क्या वैल्यू को अधिकतम करने के लिए इस विजडम का सही इस्तेमाल हुआ। NCLAT के पिछले फैसलों से पता चलता है कि एक पूरी हुई चुनौती प्रक्रिया (completed challenge process) स्वचालित रूप से सबसे ऊंची बोली लगाने वाले की जीत की गारंटी नहीं देती, और CoC बेहतर वैल्यू के लिए बातचीत कर सकता है। हालांकि, RP का तर्क है कि सख्त समय-सीमा (strict timelines) और जमा करने के बाद बोलियां बदलने के खिलाफ नियम सुरक्षा उपाय (safeguards) के तौर पर काम करते हैं, जिनका Vedanta की देर से की गई बोली ने उल्लंघन किया। इस लंबी कानूनी लड़ाई से JAL की संपत्तियों (assets) और उनसे होने वाली रिकवरी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, और यह भारत के बढ़ते डिस्ट्रेस्ड एसेट मार्केट (distressed asset market) में ऐसी ही बिड डिस्प्यूट्स (bid disputes) को संभालने के लिए एक मिसाल (precedent) कायम कर सकता है।
NCLAT में अगले कदम
NCLAT बेंच, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अशोक भूषण कर रहे हैं, ने अगली सुनवाई सोमवार के लिए तय की है। बैंकों का प्रतिनिधित्व करने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से दलीलें पेश करने की उम्मीद है। ट्रिब्यूनल का फैसला वैल्यूएशन के तरीकों की व्याख्या (interpretation) और प्रक्रियात्मक नियमों (procedural rules) को भविष्य के इंसॉल्वेंसी मामलों में कैसे लागू किया जाएगा, इसे काफी हद तक प्रभावित कर सकता है। इससे कर्ज में डूबी कंपनियों और संभावित बोलीदाताओं (potential bidders) पर असर पड़ेगा। बाज़ार बारीकी से देखेगा कि NCLAT, CoC की विस्तृत मूल्यांकन प्रणाली को प्राथमिकता देता है या Vedanta के मात्रात्मक, वैल्यू-संचालित बोलियों (quantifiable, value-driven bids) पर जोर देने को।
