Vande Bharat Sleeper Train: निर्माण में देरी, लॉन्च 2026 के अंत तक टला!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Vande Bharat Sleeper Train: निर्माण में देरी, लॉन्च 2026 के अंत तक टला!

भारतीय रेलवे की 120 वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों के निर्माण में बड़ा झटका लगा है। डिजाइन अप्रूवल में देरी के कारण इन ट्रेनों का प्रोटोटाइप (Prototype) अब 2026 के अंत तक ही लॉन्च हो पाएगा, जो कि पहले के अनुमान से 2 साल से ज्यादा की देरी है।

डिजाइन अप्रूवल में अटकी नई ट्रेन

इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में 2 साल से ज्यादा की देरी होने की आशंका है। नई वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों को लेकर डिजाइन को अंतिम मंजूरी मिलने में दिक्कतें आ रही हैं। इसकी वजह प्रोजेक्ट डेवलपर्स के साथ काम कर रहे एक जर्मन कंसल्टेंट (German Consultant) से ज़रूरी डॉक्यूमेंटेशन (Documentation) का न मिलना बताया जा रहा है।

कॉन्ट्रैक्टर्स पर असर

यह प्रोजेक्ट 2023 में शुरू हुआ था और इसमें कई बड़े औद्योगिक घराने शामिल हैं। Titagarh Rail Solutions Ltd और Bharat Heavy Electricals Ltd (BHEL) के कंसोर्टियम (Consortium) को 80 ट्रेनों का कॉन्ट्रैक्ट मिला था। डिजाइन फाइनल न होने की वजह से ये कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Manufacturing) शुरू नहीं कर पा रही हैं। इस देरी से बचने और बाहरी डिजाइन प्रोसेस पर निर्भरता कम करने के लिए, भारतीय रेलवे अब इन-हाउस (In-house) यानी अपनी खुद की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का इस्तेमाल करने पर भी विचार कर रहा है ताकि नई स्लीपर कोच का डेवलपमेंट तेजी से हो सके।

प्रोजेक्ट की कोऑर्डिनेशन में दिक्कतें

Kinet Railway Solutions, जो एक इंडो-रूसी (Indo-Russian) ज्वाइंट वेंचर (Joint Venture) है और प्रोजेक्ट का जिम्मा संभाले हुए है, उनका कहना है कि डिजाइन इंटीग्रेशन का काम अंदरूनी तौर पर हो रहा है और प्रगति जारी है। हालांकि, कंपनी ने कंसल्टेंट के साथ डॉक्यूमेंटेशन की दिक्कतों पर सीधे तौर पर कोई जवाब नहीं दिया है, जिसके कारण प्रोजेक्ट में देरी हो रही है। इस प्रोजेक्ट में 100 से ज्यादा वेंडर्स (Vendors) शामिल हैं जो अलग-अलग इंजीनियरिंग और मैकेनिकल पुर्जे सप्लाई करते हैं। डिजाइन अप्रूवल में किसी भी तरह की रुकावट पूरी सप्लाई चेन को प्रभावित करती है, जिससे कच्चे माल या लेबर की लागत बढ़ सकती है।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

Titagarh Rail Solutions और BHEL जैसी कंपनियों के निवेशकों के लिए, ऐसे बड़े सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में देरी को लेकर एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) एक बड़ी चिंता है। देरी का मतलब है बिना किसी मुनाफे के पूंजी खर्च होना, जो प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) पर असर डाल सकता है। आने वाले समय में, डिजाइन अप्रूवल मिलने की तारीख, प्रोटोटाइप के लॉन्च की असली तारीख और भारतीय रेलवे व प्राइवेट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के बीच कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों में बदलाव पर नज़र रखनी होगी। यह देखना अहम होगा कि क्या भारतीय रेलवे अपनी यूनिट्स में ज्यादा उत्पादन शिफ्ट करता है या प्राइवेट कंसोर्टियम को पटरी पर वापस लाता है, जिससे इन कंपनियों के रेवेन्यू पर असर पड़ेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.