अमेरिका के वाणिज्य विभाग (US Commerce Department) ने भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आयात होने वाले सोलर सेल और पैनल पर प्रिलिमिनरी एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने की घोषणा की है। विभाग का आरोप है कि ये देश अमेरिका में सोलर प्रोडक्ट्स को फेयर मार्केट प्राइस से कम में बेच रहे थे। इस घोषणा में भारत के लिए 123.04% की डंपिंग मार्जिन तय की गई है, जबकि इंडोनेशिया के लिए 35.17% और लाओस के लिए 22.46% की ड्यूटी लगाई गई है। इस खबर का तुरंत असर भारतीय सोलर मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर दिखा। Insolation Energy के शेयर 6.5% से अधिक गिरे, Waaree Renewable Technologies 3.6% लुढ़का, वहीं Vikram Solar, KPI Green Energy, JSW Energy, Adani Green Energy और Tata Power के शेयरों में 2% से 4% तक की गिरावट दर्ज की गई। बाजार की ओवरऑल कमजोरी ने इस गिरावट को और बढ़ा दिया।
अमेरिका पर निर्भरता बनी बड़ी चिंता
ब्रोकरेज फर्म ICICI Securities का मानना है कि इन नई अमेरिकी ड्यूटीज के कारण भारतीय सोलर प्रोडक्ट्स अमेरिका जैसे महत्वपूर्ण बाजार में अन-कॉम्पिटिटिव हो जाएंगे। यह एक बड़ी चुनौती पेश करता है, क्योंकि वित्तीय वर्ष 2023 और 2024 में भारतीय सोलर मॉड्यूल एक्सपोर्ट का 97% से 99% हिस्सा अमेरिका को ही जाता था। Waaree Energies, Adani Solar, Vikram Solar और Premier Energies जैसी कंपनियों, जिनका अमेरिका पर काफी एक्सपोर्ट निर्भरता है, अब ऑर्डर कैंसलेशन और एक्सपोर्ट वॉल्यूम में कमी के हाई रिस्क पर हैं। एक ही मार्केट पर इतनी ज्यादा निर्भरता एक बड़ी कमजोरी साबित हो रही है।
हाई वैल्यूएशन्स पर बढ़ा दबाव
ये टैरिफ्स भारतीय सोलर कंपनियों के हाई वैल्यूएशन्स पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं, जिनमें से कई कंपनियां अर्निंग्स मल्टीपल्स (P/E) पर ट्रेड कर रही हैं। उदाहरण के लिए, Adani Green Energy का पिछले बारह महीनों का P/E करीब 130-292 के बीच है, जबकि Insolation Energy का यह लगभग 209 है। Vikram Solar का P/E करीब 18, KPI Green Energy का 25-21 और Tata Power का 36-115 के आसपास है। ये हाई वैल्यूएशन्स बताते हैं कि निवेशकों ने पहले से ही काफी भविष्य की ग्रोथ को कीमत में शामिल कर लिया है। अमेरिका की यह चाल, जहां First Solar और Qcells जैसे घरेलू प्लेयर्स का भी समर्थन है, घरेलू क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन को मजबूत करने के वैश्विक प्रयास का संकेत देती है और भारत की एक्सपोर्ट स्ट्रैटेजी को चुनौती दे सकती है।
अंतिम फैसले का इंतजार, अनिश्चितता जारी
ये प्रिलिमिनरी ड्यूटीज जियोपॉलिटिकल रिस्क को उजागर करती हैं और एक्सपोर्ट पर निर्भर कंपनियों के लिए कमाई में बड़ी गिरावट की संभावना पैदा करती हैं। भारतीय सोलर फर्मों को अब अमेरिकी बाजार तक पहुंचने के लिए ज्यादा लागत का सामना करना पड़ेगा और नए रेवेन्यू स्ट्रीम्स तलाशने होंगे। अमेरिकी वाणिज्य विभाग से भारत और इंडोनेशिया के लिए 13 जुलाई को और लाओस के लिए बाद में अंतिम निर्णय की उम्मीद है। अनिश्चितता का यह दौर शेयर की कीमतों में और अधिक उतार-चढ़ाव का कारण बन सकता है। व्यापक तौर पर, प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं घरेलू सप्लाई चेन की ओर बढ़ रही हैं, जो ग्लोबल सोलर प्रोडक्शन को नया आकार दे सकती है। इससे भारतीय निर्माताओं को अपनी लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी पर फिर से विचार करने और शायद घरेलू विस्तार को तेजी देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
