टैरिफ का दोहरा असर: एक्सपोर्टरों के लिए नई राह
अमेरिका की नई ट्रेड पॉलिसी भारतीय एक्सपोर्टरों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है, और इसका असर अलग-अलग सेक्टरों पर अलग-अलग पड़ रहा है। Pearl Global और Ramkrishna Forgings जैसी कंपनियों के सामने नई चुनौतियां आ गई हैं।
Pearl Global के टेक्सटाइल और अपैरल सेगमेंट पर 15% का नया लेवी (Levy) लगाया गया है। यह मौजूदा MFN (Most Favoured Nation) ड्यूटी के ऊपर है, जो पहले से ही 15-16% के आसपास है। इसका मतलब है कि कॉटन अपैरल एक्सपोर्ट पर अब कुल मिलाकर करीब 30% की प्रभावी ड्यूटी लग गई है। Pearl Global के MD & Group President, Pallab Banerjee ने कहा कि स्थिति में अनिश्चितता बनी हुई है। हालांकि, यह नया स्ट्रक्चर फिलहाल करीब 150 दिनों के लिए प्रतिस्पर्धी देशों के लिए एक तरह का 'लेवल प्लेइंग फील्ड' (Level Playing Field) तैयार करेगा।
वहीं, Ramkrishna Forgings का ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर मुख्य रूप से सेक्शन 232 (Section 232) नियमों के तहत आता है, जिसमें 25% टैरिफ लगता है। कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर, Naresh Jalan ने बताया कि कंपनी के रेवेन्यू (Revenue) का करीब 15% इस ऊंची दर से प्रभावित होगा, जबकि 5% नॉन-ऑटो इंजीनियरिंग पार्ट्स पर 15% टैरिफ लग रहा है।
डिमांड का सहारा और 'लेवल प्लेइंग फील्ड' की हकीकत
टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए, भले ही यह 150 दिनों का 'लेवल प्लेइंग फील्ड' आया हो, लेकिन 30% की प्रभावी ड्यूटी लागत को कम करने के लिए काफी नहीं है। Banerjee ने यह भी साफ किया कि यह मामूली अंतर एक्सपोर्टर्स को ज्यादा सामान पहले भेजने के लिए प्रेरित नहीं करेगा, ऐसे में उन्हें या तो लागत का बोझ उठाना होगा या उसे ग्राहकों पर डालना होगा।
इसके विपरीत, ऑटो एंसिलरी सेक्टर (Auto Ancillary Sector) के लिए तस्वीर कुछ बेहतर दिख रही है। Ramkrishna Forgings को उम्मीद है कि अमेरिका में कमर्शियल व्हीकल (Commercial Vehicle) मार्केट की मजबूत ग्रोथ और आने वाले एमिशन नॉर्म्स (Emission Norms) में बदलाव से डिमांड बढ़ेगी। इस उम्मीद के चलते, वे टैरिफ की बढ़ी हुई लागत को सोखने की क्षमता देख रहे हैं, जो टेक्सटाइल सेक्टर में नहीं दिख रही है।
Ramkrishna Forgings का P/E रेश्यो (P/E Ratio) करीब 20x है और मार्केट कैप (Market Cap) लगभग $1.5 बिलियन है, जबकि Pearl Global का P/E करीब 25x और मार्केट कैप $800 मिलियन है।
रिफंड का झंझट और ट्रेड डील पर अनिश्चितता
Ramkrishna Forgings के MD, Naresh Jalan ने यह भी बताया कि अगर ड्यूटी की रकम ज्यादा पाई जाती है तो रिफंड (Refund) पाने की प्रक्रिया काफी जटिल है। एक्सपोर्टरों को क्लेम दाखिल करने होंगे, जिसमें कई महीने लग सकते हैं और शायद कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़े। किसी भी तरह का रिफंड मिलने पर वह ग्राहकों को ही पास किया जाएगा, जिससे कंपनियों को सीधे तौर पर ज्यादा फायदा नहीं होगा।
इसके अलावा, भारत-अमेरिका के बीच होने वाली ट्रेड डील (Trade Deal) से मिलने वाली बड़ी रियायतों को लेकर भी अभी पूरी तरह से स्पष्टता नहीं है। ऐसे में कंपनियां मौजूदा टैरिफ व्यवस्था के बीच अधूरी जानकारी के साथ काम कर रही हैं।