अमेरिकी 'ट्रेड वॉर' का भारतीय सोलर पर असर
यह फैसला भारत के तेजी से बढ़ते सोलर एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए एक बड़ा झटका है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स ने 24 फरवरी 2026 को एक ऐलान में कहा कि भारत से आने वाले क्रिस्टलाइन सिलिकॉन सोलर सेल्स और मॉड्यूल पर 125.87% की शुरुआती काउंटरवॉरिंग ड्यूटी (Preliminary Countervailing Duties) लगाई जा रही है। अमेरिकी सोलर मैन्युफैक्चरर्स की शिकायतों के बाद यह एक्शन लिया गया है, उनका आरोप है कि भारतीय कंपनियां अनुचित सब्सिडी का फायदा उठाकर अमेरिकी मार्केट में सस्ता सामान बेच रही हैं।
शेयर बाजार में अफरातफरी
इस खबर का असर तुरंत शेयर बाजार पर दिखा। 25 फरवरी 2026 को Waaree Energies के शेयर 14.6% तक गिर गए और ₹2,570.00 के निचले स्तर पर पहुंच गए। पिछले दिन के ₹3,023.50 के बंद भाव से तुलना करें तो कंपनी की मार्केट कैप लगभग ₹77,342 करोड़ तक घट गई। वहीं, Premier Energies का शेयर 10% के लोअर सर्किट पर पहुंच गया और Vikram Solar के शेयर भी 7% से ज्यादा गिरे। सिटी के एनालिस्ट विक्रम बागरी का कहना है कि इतनी ऊंची ड्यूटी के कारण भारतीय सोलर पैनल मैन्युफैक्चरर्स के लिए अमेरिकी मार्केट लगभग बंद हो जाएगा।
Waaree की अमेरिका में फैक्ट्री का दांव
Waaree Energies, जो भारत की सबसे बड़ी सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरर और एक्सपोर्टर है, का कहना है कि इस फैसले का उन पर कोई 'खास नकारात्मक असर' नहीं पड़ेगा। कंपनी अपनी अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को 4.2 GW तक बढ़ाने की योजना बना रही है। Waaree ने पहले ही टेक्सास में अपनी फैक्ट्री में बड़ा निवेश किया है और एरिज़ोना में भी कुछ एसेट्स खरीदे हैं। इस अमेरिकी प्लांट से कंपनी अपने लगभग 60% ऑर्डर पूरे करती है, जिनकी कुल वैल्यू ₹47,000 करोड़ ($5.3 बिलियन) है।
भविष्य की राहें और चुनौतियां
हालांकि, Waaree की यह रणनीति भी आसान नहीं होगी। भारत, इंडोनेशिया और लाओस मिलकर अमेरिकी सोलर मॉड्यूल इम्पोर्ट का 57% हिस्सा थे, जो अब इन नई ड्यूटीज से बुरी तरह प्रभावित होगा। अमेरिका की ट्रेड पॉलिसी में लगातार बदलाव एक बड़ी अनिश्चितता पैदा कर रहा है। Waaree का P/E रेश्यो लगभग 24.6 है, जो ग्रोथ की उम्मीद दिखाता है, लेकिन ड्यूटीज को मैनेज करने और अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने का अतिरिक्त खर्च कंपनी के लिए बड़ा फाइनेंशियल रिस्क पैदा कर सकता है।
एक्सपोर्ट पर ग्रहण, डोमेस्टिक ग्रोथ का सहारा?
Waaree के दावों के बावजूद, यह शुरुआती ड्यूटीज एक गंभीर संकेत हैं। अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग का खर्च भारत की तुलना में ज्यादा है, और ट्रेड पॉलिसी में अनिश्चितता बनी हुई है। Waaree का अमेरिकी बाजार पर भारी निर्भरता एक कमजोरी साबित हो सकती है। Premier Energies (P/E ~24.8) और Vikram Solar (P/E ~14.1) जैसी कंपनियां भी इस व्यापारिक बाधा का सामना कर रही हैं। वहीं, विक्रम सोलर के प्रमोटरों के शेयरों की गिरवी ( 48.2% ) एक अतिरिक्त जोखिम है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोलर मार्केट बनने की राह पर है, जहां 2026 में 50 GW से ज्यादा इंस्टॉलेशन होने की उम्मीद है। यह डोमेस्टिक ग्रोथ कंपनियों के लिए एक सहारा बन सकती है। लेकिन, अमेरिकी ड्यूटीज का एक्सपोर्ट रेवेन्यू पर तत्काल असर चिंता का विषय बना हुआ है। कंपनियों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे इन ट्रेड डिस्प्यूट्स से कैसे निपटती हैं, अपने एक्सपोर्ट मार्केट को कैसे डाइवर्सिफाई करती हैं और भारत की मजबूत डोमेस्टिक डिमांड का कितना फायदा उठा पाती हैं।