स्टील टैरिफ्स का बड़ा झटका
यूनाइटेड किंगडम (UK) की नई स्टील ट्रेड पॉलिसी, जो 1 जुलाई, 2026 से लागू होनी है, भारत के स्टील एक्सपोर्ट (steel exports) के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है। यह नया नियम मौजूदा व्यवस्था की तुलना में टैरिफ-फ्री स्टील इम्पोर्ट (tariff-free steel imports) को 60% तक घटा देगा। इससे भी बड़ी बात यह है कि नए कोटे (quota) से ज़्यादा वॉल्यूम पर 50% का भारी टैरिफ लगेगा, जो पहले 25% था। इस कदम का मकसद ग्लोबल ओवरकैपेसिटी (global overcapacity) के बीच यूके के घरेलू उद्योगों को सहारा देना है। भारत के लिए, जिसके स्टील एक्सपोर्ट यूके में बढ़ रहे थे, यह CETA (Comprehensive Economic and Trade Agreement) से मिलने वाले फायदों को कम कर सकता है। CETA का लक्ष्य 2030 तक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार (bilateral trade) को मौजूदा $56.9 बिलियन (2024-25) से बढ़ाकर $120 बिलियन करना है।
बढ़ता संरक्षणवाद (Protectionism) और भारत का रुख
यह स्थिति स्टील इंडस्ट्री में बढ़ते ग्लोबल प्रोटेक्शनिज्म (global protectionism) का एक बड़ा उदाहरण है। एशिया में उत्पादन बढ़ने से आई ओवरकैपेसिटी (overcapacity) ने दुनिया भर के मार्केट्स को प्रभावित किया है, जिसके चलते कई देश व्यापार रक्षा उपाय (trade defense measures) अपना रहे हैं। अमेरिका ने सेक्शन 232 टैरिफ (Section 232 tariffs) लगाए हैं, EU ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) पेश किया है, और भारत ने भी खुद सेफगार्ड ड्यूटी (safeguard duties) लगाई है। ऐसे कदम अक्सर ट्रेड टॉक्स (trade talks) को जटिल बनाते हैं। भारत ने पहले भी यूके के स्टील सेफगार्ड्स पर जवाबी टैरिफ लगाए थे। यूके का यह नया कदम, जो आंशिक रूप से ग्लोबल ओवरकैपेसिटी का जवाब है, अब CETA के रास्ते में सीधे तौर पर रुकावट बन रहा है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि यह नया कोटे का ढांचा (quota framework) एक्सपोर्ट में अपेक्षित वृद्धि को कमज़ोर कर सकता है।
'क्रिएटिव सॉल्यूशन' की तलाश
इस स्टील सेफगार्ड (steel safeguard) नियम से उत्पन्न हुए टकराव को सुलझाने के लिए भारत और यूके के बीच बातचीत जारी है। भारत के कॉमर्स सेक्रेटरी (Commerce Secretary) राजेश अग्रवाल (Rajesh Agrawal) ने कहा है कि दोनों देश एक ऐसा समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो समझौते को आगे बढ़ने दे और व्यापक ट्रेड डील को सेक्टर-स्पेशफिक टेंशन (sector-specific tensions) से बचा सके। हालांकि, इस 'क्रिएटिव सॉल्यूशन' (creative solution) की सटीक प्रकृति अभी भी स्पष्ट नहीं है, जिससे व्यवसायों के लिए अनिश्चितता बनी हुई है।
बाजार का माहौल और अनिश्चितता
यह समाधान खोजने की जल्दबाजी इस बात को दर्शाती है कि CETA को मई 2026 तक लागू करने का लक्ष्य है। भारतीय स्टील उत्पादक अपने घरेलू मार्केट्स में मजबूत प्रदर्शन दिखा रहे हैं, और 2026 में अब तक Nifty Metal Index में लगभग 20% का उछाल आया है। लेकिन यूके जैसे देशों में एक्सपोर्ट के ज़रिए विकास अब इन द्विपक्षीय व्यापार बाधाओं (bilateral trade barriers) से प्रभावित हो सकता है। तय किए गए समाधान की सफलता, यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होगी कि भारत-यूके ट्रेड पैक्ट (trade pact) खुले बाजार तक पहुंच को कितना बढ़ा पाएगा, खासकर स्टील जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए।