कलिंगनगर प्लांट बनेगा ग्रोथ का इंजन
टाटा स्टील (Tata Steel) अपनी घरेलू बिक्री बढ़ाने के लिए कलिंगनगर प्लांट पर बड़ा दांव खेल रही है। कंपनी ने इस प्लांट की क्षमता को बढ़ाकर 80 लाख टन सालाना कर दिया है। इससे उम्मीद है कि चालू फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में कंपनी की डोमेस्टिक सेल्स में 9% का उछाल आएगा। भारत में स्टील की डिमांड 8-9% की दर से बढ़ने की उम्मीद है, जो 2026 तक जारी रह सकती है। कंपनी अब ऑटोमोटिव स्टील और रिटेल ब्रांडेड प्रोडक्ट्स जैसे हाई-मार्जिन वाले प्रोडक्ट्स पर ज्यादा फोकस कर रही है, ताकि वो अपने डोमेस्टिक कॉम्पिटिटर्स से आगे निकल सके, जो सिर्फ डोमेस्टिक मार्केट पर निर्भर हैं।
विदेशी कर्ज का ऑनशोरिंग
प्रोडक्शन बढ़ाने के साथ-साथ, टाटा स्टील अपने फाइनेंसियल स्ट्रक्चर को भी मजबूत कर रही है। कंपनी इस फाइनेंशियल ईयर के अंत तक अपने विदेशी बॉन्ड्स (Bonds) को पूरी तरह से चुकाने की तैयारी में है। इस कदम का मकसद रुपये में आ रही गिरावट के रिस्क से कंपनी को बचाना है, क्योंकि इससे पहले विदेशी कर्ज की वजह से कंपनी पर करोड़ों का बोझ पड़ चुका था। आपको बता दें कि FY21 में जहां विदेशी कर्ज कंपनी के कुल कर्ज का 50% था, वहीं अब यह घटकर करीब 18% रह गया है। इससे कंपनी को डेकार्बनाइजेशन (Decarbonization) और डाउनस्ट्रीम कैपेसिटी बढ़ाने जैसे जरूरी इनवेस्टमेंट्स के लिए फंड की आसानी होगी।
इन चिंताओं से निपटना जरूरी
हालांकि, ग्रोथ की कहानी के बावजूद, टाटा स्टील के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। कंपनी के यूरोपीय ऑपरेशन्स (European operations) अभी भी मुनाफे पर दबाव बना रहे हैं, जिसके लिए लगातार रीस्ट्रक्चरिंग (Restructuring) की जरूरत पड़ रही है। वहीं, JSW Steel जैसी कंपनियां तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं और ग्लोबल स्केल हासिल करने की कोशिश में हैं, जिससे कॉम्पिटिशन और भी कड़ा हो गया है। एनालिस्ट्स (Analysts) को ग्लोबल स्टील प्राइस में उतार-चढ़ाव और पर्यावरण नियमों के बढ़ते खर्चों से मार्जिन पर असर पड़ने का डर है। नीदरलैंड्स की सब्सिडियरी (subsidiary), टाटा स्टील नीदरलैंड, को भी रेगुलेटरी (Regulatory) और परमिट से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जो कंपनी के कैश फ्लो (Cash flow) पर असर डाल सकती हैं।
आगे की राह
अब देखना यह होगा कि डोमेस्टिक ग्रोथ के फायदे, ग्लोबल बिजनेस की चुनौतियों पर कितने भारी पड़ते हैं। आने वाले समय में जब कंपनी संस्थागत निवेशकों (institutional investors) से मिलेगी, तो इस बात पर फोकस रहेगा कि क्या नई कैपेसिटी वाकई में रिटर्न ऑन इक्विटी (Return on Equity) को बढ़ा पाएगी या फिर ग्लोबल स्टील सेक्टर के साइक्लिकल डाउनटर्न (cyclical downturns) का असर इस पर भी पड़ेगा।
