Tata Steel 6 फरवरी, 2026 को अपने Q3 FY26 के नतीजों का ऐलान करेगी। इस बार कंपनी के रेवेन्यू में 14% तक की सालाना ग्रोथ की उम्मीद है, लेकिन मुनाफे (प्रॉफिट) पर दबाव की आशंका बनी हुई है। यह वो अहम तारीख है जब कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स स्टैंडअलोन और कंसॉलिडेटेड नंबर्स की समीक्षा करेंगे। पिछले क्वार्टर (Q2 FY26) में कंपनी का कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू ₹58,689 करोड़ दर्ज किया गया था, जो पिछले साल से 8.87% ज्यादा था, और नेट प्रॉफिट ₹3,183 करोड़ पर पहुंचा था। हालांकि, इस बार विश्लेषकों को उम्मीद है कि हॉट-रोल्ड कॉइल (HRC) की गिरती कीमतें और कोकिंग कोल जैसी कच्चे माल की बढ़ती लागत के चलते कंपनी के मार्जिन पर असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि इससे EBITDA (Earnings Before Interest, Taxes, Depreciation, and Amortization) पिछले क्वार्टर की तुलना में थोड़ा कम रह सकता है।
यूरोप की नई चुनौतियाँ और कॉम्पिटिशन
Tata Steel के कंसॉलिडेटेड परफॉरमेंस पर यूरोप का भी असर दिखेगा। जनवरी 2026 से लागू हुए यूरोपियन यूनियन के नए कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) नियमों के चलते वहां की स्टील इंडस्ट्री कॉम्पिटिशन और प्राइसिंग को लेकर नई चुनौतियों का सामना कर रही है। यूरोपियन स्टील वॉल्यूम में ईयर-ऑन-ईयर सुधार की उम्मीद है, लेकिन इस रीजन से EBITDA में घाटा (loss) होने का अनुमान है, हालांकि यह पिछले समय से कम हो सकता है।
शेयर बाजार की चाल और आगे की राह
भारत में स्टील सेक्टर की डिमांड फाइनेंशियल ईयर 2026 में करीब 8% बढ़ने का अनुमान है, खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर से। जनवरी 2026 में घरेलू स्टील प्राइसेज में भी तेजी देखी गई है, जो बढ़ती लागत और इंपोर्ट पर लगी सेफगार्ड ड्यूटी का नतीजा है। ग्लोबल स्टील डिमांड 2025 में फ्लैट रहने और 2026 में मामूली ग्रोथ की उम्मीद है।
मार्केट में Tata Steel का P/E रेश्यो लगभग 35.38-37.45 है, जो JSW Steel (P/E 39.2-48.09) और SAIL (P/E 21.4-30.5) के बीच है। Tata Steel का मार्केट कैप करीब ₹2.44 ट्रिलियन है, जो JSW Steel के ₹3 ट्रिलियन से कम है, लेकिन SAIL के ₹648.91 बिलियन से काफी बड़ा है।
एनालिस्ट्स का Tata Steel के लिए औसत प्राइस टारगेट ₹195.88 है, जो इसके मौजूदा ट्रेडिंग रेंज ₹193-195 से ज्यादा नहीं है। निवेशकों को इनपुट कॉस्ट की अस्थिरता, यूरोपियन यूनियन की क्लाइमेट पॉलिसीज का विदेशी कारोबार पर असर और कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) द्वारा प्राइस कोलेजन (मूल्य मिलीभगत) की चल रही जांच पर नजर रखनी चाहिए। पिछले कुछ Q3 के नतीजे भी मिले-जुले रहे हैं, जिसमें रेवेन्यू में गिरावट और कुछ बार नेट लॉस भी शामिल है, इसलिए इस बार कंपनी के एग्जीक्यूशन पर खास ध्यान रहेगा।
