मुनाफे का इंजन: इंडिया और यूरोप की दमदार चाल
Mazdoor Steel ने अपने कंसॉलिडेटेड नेट प्रॉफिट में धमाकेदार इजाफा दर्ज किया है। फाइनेंशियल ईयर 2026 की दिसंबर तिमाही (Q3 FY26) में कंपनी का मुनाफा पिछले साल की इसी अवधि के ₹295.49 करोड़ की तुलना में 9 गुना बढ़कर ₹2,730.37 करोड़ हो गया। इस दौरान, कंपनी की ऑपरेशंस से आय (Income from operations) भी बढ़कर ₹57,002 करोड़ पर पहुंच गई, जो पिछले साल ₹53,548 करोड़ थी।
इस शानदार प्रदर्शन का मुख्य कारण कंपनी के भारतीय ऑपरेशंस की जबरदस्त परफॉर्मेंस रही। भारत में कंपनी ने एक ही तिमाही में रिकॉर्ड 6 मिलियन टन डिलीवरी हासिल की, जो कि एक बड़ी उपलब्धि है। इसका श्रेय कलिंगनगर फेज II फैसिलिटी के सुचारू संचालन को भी जाता है। कंसॉलिडेटेड डिलीवरी पिछले साल के 7.72 मिलियन टन से बढ़कर 8.21 मिलियन टन हो गई। सबसे खास बात यह है कि नीदरलैंड्स ऑपरेशंस ने भी टर्नअराउंड दिखाया है, जहां EBITDA ₹9 करोड़ के घाटे से सुधरकर ₹570 करोड़ के मुनाफे में आ गया। यह यूरोपीय बाजारों में रिकवरी का संकेत है। वर्ल्ड स्टील एसोसिएशन के अनुसार, 2026 में ग्लोबल स्टील डिमांड में 1.3% की वृद्धि का अनुमान है, जो सेक्टर के लिए सकारात्मक है।
सिरदर्द: यूके ऑपरेशंस और कैपिटल एक्सपेंडिचर का बोझ
इन सब सकारात्मक खबरों के बीच, Tata Steel के यूके ऑपरेशंस लगातार चिंता का सबब बने हुए हैं। घाटे को कम करने के प्रयासों के बावजूद, जैसे कि ब्लास्ट फर्नेस को बंद करना और छंटनी, यूके बिजनेस अब तक नुकसान के चक्र से बाहर नहीं निकल पाया है। दिसंबर तिमाही में यूके बिजनेस ने ₹742 करोड़ का निगेटिव EBITDA दर्ज किया, जो पिछले साल की इसी अवधि के ₹730 करोड़ के घाटे से थोड़ा अधिक है। यूके में ऊर्जा की ऊंची लागत, जो अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में 25% तक ज्यादा हो सकती है, इस समस्या को और बढ़ाती है। इसके अलावा, यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लगाए जा सकने वाले टैरिफ (Tariff) भी यूके स्टील इंडस्ट्री के लिए खतरे की घंटी हैं, जो EU को भारी एक्सपोर्ट पर निर्भर है।
कंपनी ने कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) पर भी बड़ा निवेश जारी रखा है। तिमाही के दौरान ₹3,291 करोड़ और नौ महीनों में ₹10,370 करोड़ का निवेश किया गया। इस बड़े निवेश के बावजूद, कंपनी ने क्वार्टर-ऑन-क्वार्टर अपने नेट डेट (Net Debt) में ₹5,206 करोड़ की कमी की है, जिससे कुल नेट डेट घटकर ₹81,834 करोड़ रह गया है। फरवरी 2026 की शुरुआत तक, Tata Steel का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) लगभग ₹2.46 ट्रिलियन था।
वैल्यूएशन और मार्केट की नजर
Mazdoor Steel का ट्रेलिंग ट्वेल्व मंथ्स (TTM) प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो लगभग 33.5 से 37.5 के बीच है। यह वैल्यूएशन भारतीय स्टील सेक्टर में प्रतिस्पर्धी है, हालांकि इसके प्रतिद्वंद्वी JSW Steel का P/E रेशियो 37-67 के बीच है और मार्केट कैप लगभग ₹3 ट्रिलियन है। वहीं, Steel Authority of India (SAIL) का P/E रेशियो 21-33 और मार्केट कैप लगभग ₹66,555 करोड़ है। Tata Steel का रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) कुछ रिपोर्ट्स में 14.71% बताया गया है, हालांकि कुछ अन्य में यह कम है। पिछले पांच सालों में कंपनी की सेल्स ग्रोथ 9.34% रही है और पिछले तीन सालों का ROE 6.23% रहा है।
एनालिस्ट (Analyst) की राय मिली-जुली है। 2025 के अंत में कुछ ब्रोकरेज फर्मों ने 'Buy' रेटिंग और 18-19% तक के अपसाइड टारगेट दिए थे। घरेलू ब्रोकरेज फर्मों ने पिछले साल के कमजोर बेस के चलते Q3 FY26 में बड़े ईयर-ऑन-ईयर प्रॉफिट ग्रोथ का अनुमान लगाया था, जो 200-600% तक था। टेक्निकल मोर्चे पर, Tata Steel बुलिश (Bullish) दिख रहा है, जिसने 4 फरवरी 2026 तक पिछले एक साल में +46.63% का रिटर्न दिया है।
जोखिम और चुनौतियां (The Bear Case)
मुनाफे में आया यह भारी उछाल काफी हद तक पिछले साल की Q3 FY25 की कमजोर परफॉर्मेंस (₹295.49 करोड़ का मुनाफा) के कारण भी है। कंपनी की वर्तमान लाभप्रदता काफी हद तक घरेलू बाजार की मजबूती पर निर्भर है, जिसे सरकारी संरक्षणवादी उपायों (जैसे नया तीन साल का इंपोर्ट टैरिफ) का सहारा मिला है। यह वैश्विक ओवरसप्लाई और कमजोर मूल्य निर्धारण का मुकाबला करने के लिए है। यूके ऑपरेशंस में लगातार हो रहा भारी नुकसान अंतरराष्ट्रीय बाजारों की संरचनात्मक चुनौतियों को दर्शाता है, जहां मांग कमजोर बनी हुई है और इंपोर्ट कंपटीशन कड़ी है। EU के नए कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) ने यूरोपीय ऑपरेशंस के लिए नई नियामक जटिलताएं पैदा कर दी हैं, जो मार्जिन को प्रभावित कर सकती हैं। यूके की स्टील इंडस्ट्री, जो EU टैरिफ प्रस्तावों के कारण 'सबसे बड़े संकट' का सामना कर रही है, विशेष रूप से कमजोर है, क्योंकि इसका 78-80% एक्सपोर्ट EU को होता है।
भविष्य की राह
FY26 के लिए भारतीय स्टील सेक्टर में 7-8% की मध्यम मांग वृद्धि का अनुमान है। हालांकि, ICRA के अनुसार, वैश्विक कीमतों में नरमी और चीन से बढ़ते एक्सपोर्ट के कारण मार्जिन लगभग 12.5% पर स्थिर रहने की उम्मीद है। Tata Steel अपनी भारतीय क्षमता को बढ़ाने, वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स विकसित करने और लागत में सुधार की पहलों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिससे कंपनी इन परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार है। यूके में जारी चुनौतियों और विकसित हो रही वैश्विक व्यापार नीतियों के बीच, कंपनी का मजबूत घरेलू प्रदर्शन और यूरोपीय ऑपरेशंस में सुधार भविष्य के विकास की नींव रखता है।