भारत की ग्रोथ ने ग्लोबल चुनौतियों को दी मात
Tata Steel के शेयरधारकों के लिए Q3 FY26 के नतीजे बेहद शानदार रहे। कंपनी ने ₹2,730 करोड़ का नेट प्रॉफिट घोषित किया है, जो पिछले साल की इसी अवधि के ₹295 करोड़ की तुलना में एक बड़ी छलांग है। इस दमदार प्रदर्शन के पीछे मुख्य वजह भारत में बिक्री की मात्रा में बढ़ोतरी है, जो 7.72 मिलियन टन से बढ़कर 8.21 मिलियन टन हो गई, साथ ही बेहतर मूल्य निर्धारण का भी इसमें बड़ा योगदान रहा। इसके चलते कंपनी का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू ₹56,646 करोड़ तक पहुंच गया। कंपनी के EBITDA में भी ₹7,155 करोड़ से ₹8,270 करोड़ तक का इजाफा देखा गया, जबकि EBITDA प्रति टन ₹7,759 से बढ़कर ₹10,116 हो गया।
भारत ऑपरेशन्स इस ग्रोथ के इंजन साबित हुए। ऑटोमोटिव सेगमेंट में 20% की ईयर-ऑन-ईयर वॉल्यूम ग्रोथ देखी गई, वहीं रिटेल वर्टिकल ने ₹2,380 करोड़ का ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू (GMV) दर्ज किया, जो पिछले साल की तुलना में 68% अधिक है। भविष्य की ग्रोथ के लिए कंपनी अपनी क्षमता का विस्तार कर रही है। इसमें नीलंछल इस्पात निगम (Neelanchal Ispat Nigam) में 4.8 MTPA का विस्तार और लुधियाना में 0.75 MTPA का इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) शामिल है, जो लॉन्ग प्रोडक्ट्स पोर्टफोलियो को मजबूत करेगा। इसके अलावा, टाटा ब्लूस्कोप स्टील (अब टाटा स्टील कलर्स) के अधिग्रहण से ₹919 करोड़ का फेयर वैल्यू गेन भी कंपनी के नतीजों में जुड़ा।
यूके में मंदी और यूरोप में धीमी रिकवरी
जहां भारत में टाटा स्टील का प्रदर्शन परचम लहरा रहा था, वहीं कंपनी के इंटरनेशनल ऑपरेशन्स, खासकर यूके, ने एक निराशाजनक तस्वीर पेश की। यूके में £63 मिलियन का भारी EBITDA लॉस दर्ज किया गया, जबकि रेवेन्यू £468 मिलियन रहा। इसका मुख्य कारण कमजोर मांग और लगातार इंपोर्ट का दबाव रहा। 2024 में यूके में क्रूड स्टील प्रोडक्शन में 29% की भारी गिरावट आई, जिससे इसका ग्लोबल प्रोडक्शन में स्थान और कम हो गया।
इसके विपरीत, नीदरलैंड्स सेगमेंट ने €1.35 बिलियन के रेवेन्यू और €55 मिलियन के EBITDA के साथ यूरोपीय बाजार में कुछ स्थिरता दिखाई। हालांकि, बड़े यूरोपीय बाजार में मांग अभी भी कमजोर है, लेकिन 2026 की शुरुआत में लिमिटेड इंपोर्ट सप्लाई और यूरोपीय मिल प्राइस हाइक्स के चलते कीमतों में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं। EU में स्टील की अनुमानित खपत 2025 में फिर से घटने की उम्मीद है, जिसके बाद 2026 में मामूली रिकवरी की संभावना है, लेकिन यह प्री-पैंडेमिक स्तरों से काफी नीचे रहेगी। 1 जनवरी 2026 से लागू होने वाले EU के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का यूरोपीय ऑपरेशन्स, जिनमें यूके भी शामिल है, पर अतिरिक्त प्रभाव पड़ेगा।
वित्तीय मजबूती और ऑपरेशनल रेजिलिएंस
वित्तीय मोर्चे पर, कंपनी ने मजबूत लिक्विडिटी ₹44,062 करोड़ (जिसमें ₹10,765 करोड़ कैश और कैश इक्विवेलेंट शामिल हैं) का समर्थन दिखाया, जिसके चलते कंसोलिडेटेड नेट डेट घटकर ₹81,834 करोड़ रह गया। एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और सीएफओ कौशिक Chatterjee ने लागत कम करने की पहलों पर जोर दिया, जिनसे बेहतर ऑपरेटिंग KPIs, सप्लाई चेन एफिशिएंसी और प्रोक्योरमेंट स्ट्रेटेजी के जरिए लगभग ₹3,000 करोड़ की बचत हुई। ये कॉस्ट कंट्रोल और डेट मैनेजमेंट के उपाय कंपनी को वोलेटाइल ग्लोबल स्टील मार्केट में एक सहारा देते हैं, जहां चीन से लगातार ओवरसप्लाई कीमतों पर दबाव बना रही है।
वैल्यूएशन और एनालिस्ट की राय
बाजार में Tata Steel का P/E ratio (TTM) करीब 33.5 से 37.5 के बीच चल रहा है, और फरवरी 2026 की शुरुआत तक इसकी मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹2.43 ट्रिलियन थी। इसकी ROE करीब 14.71% है, जो SAIL के 10.09% से बेहतर और JSW Steel के 14.01% के बराबर है। ब्रोकरेज हाउसेस की राय मिली-जुली है। कुछ ब्रोकर्स ने 'Buy' रेटिंग और टारगेट प्राइस दिए हैं जो मौजूदा स्तरों से बढ़त का संकेत देते हैं, वहीं कुछ ने मामूली गिरावट की भी आशंका जताई है। उदाहरण के लिए, Motilal Oswal ने 2025 के अंत में Tata Steel को 'Buy' रेटिंग देकर 19% तक की बढ़त का टारगेट प्राइस दिया था।
मार्केट का परिदृश्य और आउटलुक
वैश्विक स्टील की कीमतें लगातार दबाव में हैं, जिसका मुख्य कारण चीन से जारी ओवरकैपेसिटी और एक्सपोर्ट्स हैं। दुनिया भर में कैपेसिटी यूटिलाइजेशन रेट 75% से नीचे गिर गया है, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और प्रॉफिटेबिलिटी प्रभावित हुई है। भारत में मांग मजबूत बनी हुई है, लेकिन सस्ते इंपोर्ट घरेलू कीमतों पर दबाव डाल रहे हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि वैश्विक स्टील की कीमतों में 2025 के मध्य से अंत तक गिरावट जारी रह सकती है, जिसके बाद 2027 तक सुधार की उम्मीद है, हालांकि इसमें काफी अनिश्चितता है। यूके जैसे बाजार विशेष रूप से स्ट्रक्चरल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। Tata Steel की क्षमता विस्तार, वैल्यू-ऐडेड प्रोडक्ट्स में डायवर्सिफिकेशन और कॉस्ट ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम जैसी रणनीतियाँ इसे इन जटिल बाजार स्थितियों में नेविगेट करने में मदद करेंगी।