यह शेयर ₹211.35 के स्तर को पार कर अपने अब तक के सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुंच गया है, जिसका मुख्य श्रेय भारत में मजबूत डोमेस्टिक डिमांड और कंपनी के Q3 FY26 के शानदार नतीजों को जाता है। इस तिमाही में कंपनी की डोमेस्टिक डिलीवरीज़ रिकॉर्ड स्तर पर रहीं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी की ऑपरेटिंग इनकम में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 6% की बढ़ोतरी देखी गई और यह ₹57,002 करोड़ रही। स्टील सेल्स वॉल्यूम में भी 6% की बढ़त के साथ यह लगभग 8.2 मिलियन टन तक पहुंच गया। हालांकि, इन सबके बावजूद, मार्जिन पर थोड़ा दबाव देखा गया। EBITDA मार्जिन पिछली तिमाही की तुलना में घटकर 14.4% पर आ गया, जो एक चिंता का विषय है।
अगर वैल्यूएशन की बात करें, तो Tata Steel का P/E रेश्यो (Price-to-Earnings Ratio) फिलहाल 28.5x से 38.2x के बीच है। वहीं, इसके प्रमुख घरेलू प्रतिद्वंद्वी JSW Steel का P/E रेश्यो लगभग 40.54x से 52.8x और Jindal Steel & Power का 60.82x से 62.29x के आसपास है। Steel Authority of India (SAIL) का P/E रेश्यो करीब 33.0x है। इंडस्ट्री का औसत P/E रेश्यो 21.1x है। यह तुलना बताती है कि Tata Steel अपने कुछ घरेलू साथियों की तुलना में P/E के मामले में बेहतर वैल्यू पेश कर सकता है।
कंपनी का नेट डेट (Net Debt) से EBITDA का रेश्यो दिसंबर 2025 तक सुधरकर 2.59x हो गया है, जो मार्च 2024 में 5.06x था। हालांकि, यह अभी भी इसके 5-साल के औसत 2.87x से थोड़ा ऊपर है।
दूसरी तरफ, यूरोप का बाजार कई रेगुलेटरी मुश्किलों का सामना कर रहा है। 1 जनवरी, 2026 से कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) पूरी तरह लागू होने जा रहा है। इससे उन देशों से आने वाले इंपोर्ट पर भारी लागत लगेगी, जहां कार्बन उत्सर्जन ज्यादा होता है। अनुमान है कि भारत और चीन जैसे देशों के लिए यह लागत €144 प्रति टन या उससे अधिक हो सकती है। यह यूरोपीय स्टील उत्पादकों के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन EU में डिमांड रिकवरी अभी धीमी है, जिसके 2026 में केवल 3% रहने का अनुमान है, जो महामारी-पूर्व के स्तरों से काफी कम है।
इन चुनौतियों के बावजूद, एनालिस्ट्स का नज़रिया अभी भी सकारात्मक है। Morgan Stanley ने 'Overweight' रेटिंग के साथ टारगेट प्राइस को बढ़ाकर ₹215 कर दिया है। वहीं, Motilal Oswal, ICICI Securities, JM Financial और Emkay Global जैसी कई ब्रोकरेज फर्म्स ने 'Buy' रेटिंग दी है और ₹230 से ₹250 तक के टारगेट प्राइस दिए हैं। ये टारगेट्स भारत में मजबूत डिमांड और EU बिज़नेस में धीरे-धीरे सुधार की उम्मीदों पर आधारित हैं।
हालांकि, कुछ जोखिम भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। EBITDA मार्जिन में यह क्रमिक गिरावट (sequential decline) लागत में बढ़ोतरी या कुछ सेगमेंट में कम प्राइसिंग पावर का संकेत दे सकती है। CBAM का पूरा असर अभी सामने आना बाकी है और यह इंपोर्टेड स्टील की लागत बढ़ा सकता है, जिससे डिमांड प्रभावित हो सकती है। यूरोप में नेदरलैंड्स का बिज़नेस तो सुधरा है, लेकिन यूके का बाजार अभी भी कमजोर बना हुआ है। भारत में कैपेसिटी बढ़ाने की योजनाएं भी जोखिम भरी हो सकती हैं, अगर डिमांड उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी तो ओवरसप्लाई की स्थिति बन सकती है।
कंपनी को उम्मीद है कि Q4 FY26 में परफॉरमेंस और सुधरेगी। भारत में सेफगार्ड ड्यूटीज़ और नेट सेल्स रियलाइजेशन में बढ़ोतरी से प्राइस रिकवरी का अनुमान है, जिससे 12% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। Tata Steel का लक्ष्य 2030 तक 40 MTPA (मिलियन टन प्रति वर्ष) कैपेसिटी तक पहुंचना है ताकि बढ़ती राष्ट्रीय डिमांड को पूरा किया जा सके।