झारखंड माइनिंग ऑफिस का ₹1,755 करोड़ का नोटिस
Tata Steel के माइनिंग ऑपरेशंस एक बार फिर जांच के घेरे में आ गए हैं। कंपनी को झारखंड के रामगढ़ स्थित डिस्ट्रिक्ट माइनिंग ऑफिस से ₹1,755 करोड़ का डिमांड नोटिस मिला है। आरोप है कि कंपनी ने अपनी वेस्ट बोकारो कोलियरी में 2000-01 से 2006-07 के फाइनेंशियल ईयर के दौरान 1.62 करोड़ मेट्रिक टन कोयला निर्धारित सीमा से अधिक निकाला था। यह डिमांड 2017 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के आधार पर आई है, जिसके मुताबिक, तय योजना से ज्यादा खनन करना अवैध है और इस पर अतिरिक्त निकाली गई मात्रा के पूरे मार्केट वैल्यू के बराबर पेनल्टी लगाई जा सकती है।
कंपनी का रुख और अन्य कानूनी मामले
हालांकि, Tata Steel इस डिमांड नोटिस को पूरी तरह से चुनौती दे रही है। कंपनी का कहना है कि यह डिमांड बिना किसी औचित्य (justification) और ठोस आधार के जारी की गई है, और वह इसके खिलाफ कानूनी अपील दायर करेगी। यह नया विवाद Tata Steel के सामने खड़ी कई कानूनी और रेगुलेटरी मुश्किलों में एक और इजाफा है। इससे पहले भी कंपनी पर क्रोम अयस्क (chrome ore) की कथित कमी को लेकर करीब ₹4,313 करोड़ और जीएसटी (GST) विवाद में ₹1,100 करोड़ से ज्यादा के दावों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए कंपनी ने विभिन्न कानूनी मंचों से अंतरिम राहत भी हासिल की है।
वैल्यूएशन, मार्केट और लागत का दबाव
कंपनी के वैल्यूएशन पर नजर डालें तो, Tata Steel का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो करीब 27.0x है। यह इसके प्रतिस्पर्धी SAIL (लगभग 22.0x) से ज्यादा है, लेकिन JSW Steel (लगभग 37.0x) से कम है। लगभग ₹2.5 ट्रिलियन के मार्केट कैप वाली Tata Steel को कुछ एनालिस्ट 'मॉडरेटली ओवरवैल्यूड' मान रहे हैं, क्योंकि इसका P/E पिछले 10 सालों के औसत से 222% ऊपर ट्रेड कर रहा है।
इन सब के बीच, ग्लोबल मार्केट में भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) के कारण स्टील सेक्टर पर दबाव बढ़ा है। मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों ने स्टील की कीमतों में 20-25% की तेजी ला दी है, वहीं कच्चे तेल और फ्रेट (freight) की लागत भी बढ़ी है, जिससे स्टील निर्माताओं का खर्चा बढ़ रहा है। इन सब वजहों से पिछले महीने Nifty Metal इंडेक्स में करीब 9% की गिरावट आई थी। Tata Steel के शेयर में भी 30 मार्च 2026 को 2.27% की गिरावट दर्ज की गई थी।
आगे की राह और चुनौतियां
यह ₹1,755 करोड़ की नई डिमांड, मौजूदा कानूनी मामलों के साथ मिलकर, कंपनी पर वित्तीय दबाव बढ़ा सकती है और निवेशकों के भरोसे पर भी असर डाल सकती है। इन बड़े दावों का पैमाना यह सवाल खड़े करता है कि क्या कंपनी के इंटरनल कंप्लायंस फ्रेमवर्क (internal compliance frameworks) पर्याप्त हैं। इन सब मुश्किलों के बीच, Tata Steel को अपने स्टॉक पर पड़ने वाले असर, बढ़ती लागतों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से निपटना होगा। भविष्य में कंपनी की चाल इन कानूनी लड़ाइयों और वोलेटाइल कमोडिटी मार्केट पर निर्भर करेगी।