ऑटो की बहार, निर्माण में सुस्ती: डिमांड में आया बड़ा अंतर
Tata Steel के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर TV Narendran ने बताया कि कंपनी के लिए बाजार की स्थिति दो हिस्सों में बंटी हुई है। ऑटो सेक्टर में अच्छी रिकवरी देखी जा रही है, जिसने फ्लैट स्टील की डिमांड को बूस्ट किया है। वहीं, दूसरी तरफ, चुनाव और अन्य वजहों से निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में धीमी गति है, जिसका सीधा असर लॉन्ग स्टील की डिमांड पर पड़ रहा है।
ग्लोबल सप्लाई में बदलाव और बढ़ती कीमतें
स्थानीय स्तर पर नरमी के बावजूद, Tata Steel को उम्मीद है कि स्टील की कीमतें स्थिर रहेंगी। इसकी वजहें हैं - कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत और सस्ते इम्पोर्टेड स्टील की कम होती उपलब्धता। अभी, इम्पोर्टेड स्टील घरेलू स्टील के मुकाबले ₹2,000 से ₹3,000 प्रति टन महंगा पड़ रहा है। ग्लोबल मार्केट में भी बड़े बदलाव हो रहे हैं। वेस्ट एशिया में भू-राजनीतिक तनावों के कारण ईरान के एक्सपोर्ट में कमी आई है, जबकि चीन के एक्सपोर्ट नियमों में सख्ती से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई पर दबाव कम हुआ है।
मार्जिन पर दबाव, पर प्राइसिंग पावर मजबूत
यह एक बड़ा सवाल है कि कीमतों में बढ़ोतरी से कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन पर कितना असर पड़ेगा। ग्लोबल कीमतों, करेंसी में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों की वजह से इनपुट कॉस्ट लगातार बढ़ रही है, जिससे प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव बना हुआ है। Tata Steel का अनुमान है कि जून तिमाही में भारतीय स्टील की कीमतें पिछली तिमाही के मुकाबले लगभग ₹6,000 प्रति टन ज्यादा होंगी, और यूरोप में भी ऐसे ही इजाफे की उम्मीद है। हालांकि, कंपनी का यह भी कहना है कि कीमतों में हुई हर बढ़ोतरी सीधे मुनाफे में तब्दील नहीं होगी, जिससे मार्जिन पर कुछ हद तक दबाव बना रह सकता है।
Q4 FY26 के नतीजे: मुनाफे में 147% की छलांग
कंपनी ने फाइनेंशियल ईयर 2026 की चौथी तिमाही (Q4 FY26) में ₹2,965 करोड़ का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट दर्ज किया है, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 147% ज्यादा है। इसी दौरान कंपनी का रेवेन्यू 13% बढ़कर ₹63,270 करोड़ हो गया। बावजूद इसके, एनालिस्ट्स बढ़ती लागतों को देखते हुए मार्जिन की स्थिरता पर सवाल उठा रहे हैं।
Tata Steel और JSW Steel की तुलना
Tata Steel का मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹2.61 लाख करोड़ है और इसका TTM P/E रेश्यो करीब 25-28x के आसपास है। वहीं, JSW Steel का वैल्यूएशन लगभग ₹3.11 लाख करोड़ है, जिसका P/E रेश्यो कुछ स्रोतों के अनुसार 13-14x के बीच है, हालांकि कुछ अन्य इसे 40x से ऊपर भी बताते हैं। यह वैल्यूएशन अंतर उनके ग्रोथ और रिस्क को लेकर मार्केट की अलग-अलग राय को दर्शाता है। JSW Energy द्वारा हिस्सेदारी बेचने के बाद JSW Steel के शेयर में थोड़ी गिरावट देखी गई थी। वहीं, Tata Steel के शेयर भी Q4 के मजबूत नतीजों के बावजूद लगभग 3-4% गिरे, जिसकी वजह यूरोप में कंपनी के ऑपरेशंस और बढ़ती लागतों को लेकर चिंताएं थीं। JSW Steel की योजना FY32 तक अपनी कैपेसिटी को बढ़ाकर 78 मिलियन टन करने की है, जबकि Tata Steel भी लुधियाना में स्क्रैप-आधारित EAF प्लांट जैसी नई टेक्नोलॉजी और कैपेसिटी में निवेश कर रही है।
भारत का बढ़ता स्टील सेक्टर
भारत दुनिया के बड़े स्टील उत्पादकों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। अप्रैल 2026 में क्रूड स्टील प्रोडक्शन में 5.8% की सालाना बढ़ोतरी देखी गई, और इसी अवधि में इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग की वजह से तैयार स्टील के इस्तेमाल में 8.1% की जोरदार ग्रोथ हुई। नेशनल स्टील पॉलिसी का लक्ष्य 2030 तक 300 MTPA कैपेसिटी हासिल करना है, जो इस सेक्टर के लिए सरकारी समर्थन को दर्शाता है। चीन के प्रोडक्शन में कमी और मिडिल ईस्ट के संघर्षों से सप्लाई चेन में आई दिक्कतों के चलते ग्लोबल स्टील की कीमतें भी मजबूत हो रही हैं।
जोखिम और आगे की राह
फ्लैट प्रोडक्ट्स और ग्लोबल कीमतों के सकारात्मक आउटलुक के बावजूद, Tata Steel को कुछ जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। यूरोप में, खासकर नीदरलैंड्स में, रेगुलेटरी बदलावों और रीस्ट्रक्चरिंग कॉस्ट के कारण Q1 FY27 में EBITDA में बड़ी गिरावट आ सकती है। ये यूरोपीय समस्याएं और यूके की रीस्ट्रक्चरिंग, कंपनी के दूसरे इलाकों में होने वाले फायदों को खत्म कर सकती हैं। इनपुट कॉस्ट, जैसे आयरन ओर और कोकिंग कोल में तेज उछाल, लगातार प्रॉफिट मार्जिन पर खतरा बना रहा है।
Motilal Oswal और Emkay Global जैसे एनालिस्ट्स ने भारतीय डिमांड और प्राइसिंग पोटेंशियल को देखते हुए 'Buy' रेटिंग दी है, जिनके टारगेट लगभग ₹250 और ₹230 हैं। वहीं, JPMorgan ने यूरोपियन प्रॉफिटेबिलिटी और रेगुलेशन को लेकर चिंता जताते हुए 'Neutral' रेटिंग दी है।
कंपनी का फोकस ग्रीन स्टील पर भी है, जिसका उदाहरण लुधियाना में EAF प्लांट है। जून तिमाही के लिए कीमतों का संकेत यह बताता है कि सपोर्ट जारी रहेगा, लेकिन निवेशकों के लिए लागत प्रबंधन और प्राइसिंग पावर के बीच संतुलन बनाना Tata Steel की प्रॉफिटेबिलिटी को बेहतर बनाने की दिशा में सबसे अहम कड़ी होगी।