बोर्ड में क्यों मची खलबली?
Tata Sons के बोर्ड में चेयरमैन N Chandrasekaran के दूसरे कार्यकाल के विस्तार पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक को अचानक टाल दिया गया है। इस फैसले के पीछे Noel Tata (Tata Trusts के चेयरमैन) द्वारा जताई गई चिंताएं मुख्य वजह बताई जा रही हैं। उन्होंने खास तौर पर Tata Digital (Tata Neu ऐप की पैरेंट कंपनी), Air India और Tata Electronics जैसी नई और महत्वाकांक्षी वेंचर्स में हो रहे भारी नुकसान और बढ़ते कर्ज पर सवाल उठाए हैं।
कर्ज़ का पहाड़ और IPO का डर
रिपोर्ट्स के अनुसार, इन नई कंपनियों में लगातार हो रहे घाटे को पूरा करने के लिए भारी भरकम कर्ज लेना पड़ रहा है। Noel Tata की चिंता है कि कर्ज का यह बोझ इतना बढ़ सकता है कि Tata Sons को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के तहत इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) लाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। आपको बता दें कि RBI के नियमों के अनुसार, कुछ बड़ी नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनियों (NBFCs) को लिस्ट होना अनिवार्य है। यह स्थिति Tata Sons के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि ग्रुप अपनी पब्लिक लिस्टिंग से बचने और एक अनलिस्टेड कंपनी बने रहने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में, Tata Sons ने ₹20,000 करोड़ से अधिक का कर्ज चुकाकर अपनी NBFCs की पहचान सरेंडर की थी, ताकि इस लिस्टिंग की बाध्यता से बचा जा सके।
चेयरमैन का विज़न और हकीकत
N Chandrasekaran, जो फरवरी 2027 में अपने दूसरे कार्यकाल का समापन करेंगे, ने 2017 में चेयरमैन का पद संभाला था। उनके नेतृत्व में Tata Group ने सेमीकंडक्टर और एविएशन जैसे भविष्य के क्षेत्रों में बड़े निवेश किए हैं। Tata Electronics ने फाइनेंशियल ईयर 25 में ₹66,601 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया है और यह सेमीकंडक्टर क्षेत्र में एक बड़ा प्लेयर है।
हालांकि, अन्य वेंचर्स की कहानी अलग है। 2022 में एक्वायर की गई Air India के लिए मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। फाइनेंशियल ईयर 26 के लिए इसके घाटे का अनुमान ₹15,000 करोड़ से अधिक है, और एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसे मुनाफे में आने में तीन से चार साल लग सकते हैं। वहीं, Tata Digital के सुपर ऐप Tata Neu को भी फाइनेंशियल ईयर 25 में ₹4,609.9 करोड़ का घाटा हुआ है, और कंपनी लागत कम करने के लिए छंटनी पर भी विचार कर रही है।
आगे क्या?
बाजार के जानकारों का कहना है कि बोर्ड का यह फैसला इस बात का संकेत है कि नेतृत्व की निरंतरता सुनिश्चित करने से पहले नई वेंचर्स में वित्तीय अनुशासन और रणनीतिक फोकस जैसे बड़े मुद्दों को सुलझाना ज़रूरी है। Tata Sons के लिए यह एक नाजुक संतुलन साधने वाली स्थिति होगी, जिसमें एक तरफ नई, पूंजी-गहन (capital-intensive) कंपनियों को आगे बढ़ाना होगा, तो दूसरी तरफ ग्रुप की वित्तीय सेहत और अनलिस्टेड स्टेटस को बनाए रखना होगा। इस मामले का नतीजा आने वाले वर्षों में Tata Sons की पूंजी आवंटन (capital allocation) और गवर्नेंस की रणनीति को दिशा देगा।