टाटा संस (Tata Sons) के बोर्ड रूम में एक बड़ा फैसला टल गया है। बोर्ड ने चेयरमैन N Chandrasekaran के तीसरे कार्यकाल के री-अपॉइंटमेंट (reappointment) पर फिलहाल कोई निर्णय नहीं लिया है। यह फैसला 24 फरवरी, 2026 को हुई बोर्ड मीटिंग में लिया गया और इसके पीछे की मुख्य वजह Tata Trusts के चेयरमैन Noel Tata की आपत्तियां हैं। Tata Trusts की Tata Sons में 66% हिस्सेदारी है। Chandrasekaran का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 तक है, और उम्मीद थी कि उन्हें एक्सटेंशन मिलेगा, लेकिन Noel Tata के हस्तक्षेप से अनिश्चितता बढ़ गई है।
फाइनेंसियल चिंताओं और स्ट्रैटेजी पर मतभेद
Noel Tata ने Chandrasekaran की नियुक्ति के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। इनकी जड़ें ग्रुप की कंपनियों, खासकर Air India के बढ़ते घाटे और नए सेमीकंडक्टर व बैटरी वेंचर्स में हो रहे भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (capital expenditure) से जुड़ी हैं। इसके अलावा, Tata Sons को पब्लिक में लिस्ट (public listing) करने की बात पर भी Noel Tata ने सवाल उठाए हैं। RBI के नियमों के अनुसार, ऊपरी-स्तर की नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) को 30 सितंबर, 2025 तक लिस्ट होना है। Tata Sons ने CIC स्टेटस सरेंडर करने का आवेदन किया है ताकि वे प्राइवेट रह सकें, लेकिन RBI का फैसला अभी आना बाकी है। ये चिंताएं ग्रुप को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा करती हैं जहाँ आक्रामक विस्तार की योजनाओं का सामना वित्तीय अनुशासन और रेगुलेटरी अनुपालन से हो रहा है।
गहरी पड़ताल: मार्केट और कंपनी पर असर
यह लीडरशिप का टकराव ऐसे समय में आया है जब टाटा ग्रुप पर हाल के दिनों में वित्तीय दबाव देखा गया है। साल 2025 में, ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट वैल्यू ₹4.56 लाख करोड़ से ज्यादा घट गया। Tata Motors और TCS जैसी फ्लैगशिप कंपनियों में भी गिरावट आई। Tata Motors के शेयर अपने चरम से करीब 42% नीचे आ गए, जिसका असर Jaguar Land Rover (JLR) की दिक्कतों से जुड़ा था। TCS ने FY25 में $30.18 बिलियन का रेवेन्यू दर्ज किया, लेकिन टेक्नोलॉजी में बदलाव और AI कॉम्पिटिशन के चलते इसके शेयर 22% गिरे। एक्सपर्ट्स TCS पर अभी भी बुलिश हैं और इसका टारगेट प्राइस ₹4,400 तक है, लेकिन कुछ ब्रोकरेज फर्म ने इसे 'Sell' रेटिंग भी दी है। वहीं, Tata Motors का P/E रेशियो फरवरी 2026 में 63.96 था, जो Toyota (10.4) और Ford (14.8) जैसे कॉम्पिटिटर्स से काफी ऊपर है। ग्रुप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में ₹270 बिलियन और गुजरात में वेफर फैब्रिकेशन यूनिट के लिए ₹910 बिलियन का निवेश कर रहा है। EV बैटरी वेंचर Agratas में भी $1.5 बिलियन का निवेश होना है। ये बड़े निवेश, Air India के लगातार घाटे के साथ मिलकर, उस वित्तीय दबाव को बढ़ा रहे हैं जिसे Noel Tata ठीक करना चाहते हैं।
मुख्य जोखिम और चुनौतियाँ
चेयरमैन की री-अपॉइंटमेंट का टलना Tata Sons और पूरे ग्रुप के लिए कई बड़े जोखिम पैदा करता है। सबसे बड़ा खतरा गवर्नेंस में लंबी अस्थिरता का है, जो 2016 के Cyrus Mistry विवाद की याद दिलाता है और इससे निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है। Tata Sons की लिस्टिंग स्टेटस का मुद्दा एक बड़ी रेगुलेटरी और स्ट्रैटेजिक अनिश्चितता बना हुआ है; अगर यह हल नहीं हुआ तो RBI की ओर से कार्रवाई हो सकती है। Air India जैसी सहायक कंपनियों की वित्तीय हालत लगातार ग्रुप के लिए बोझ बनी हुई है। सेमीकंडक्टर और बैटरी जैसे नए क्षेत्रों में बड़ा कैपिटल एक्सपेंडिचर, लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए है, लेकिन इसमें एग्जीक्यूशन रिस्क (execution risk) है और यह कैश फ्लो पर दबाव डाल सकता है। IT सेक्टर में TCS पर बढ़ता कॉम्पिटिशन और ऑटो सेक्टर में JLR और EV मार्केट की चुनौतियाँ भी लगातार ऑपरेशनल दिक्कतें खड़ी कर रही हैं।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें Tata Trusts और Tata Sons बोर्ड के बीच इन गवर्नेंस और स्ट्रैटेजिक मतभेदों के समाधान पर टिकी हैं। Chandrasekaran का कार्यकाल फरवरी 2027 तक है, लेकिन अनसुलझे मुद्दे लीडरशिप की निरंतरता और स्ट्रैटेजी लागू करने में चुनौतियाँ खड़ी कर सकते हैं। बाज़ार Tata Sons के रेगुलेटरी स्टेटस पर किसी भी स्पष्टता का इंतज़ार करेगा और साथ ही यह भी देखेगा कि ग्रुप नए टेक्नोलॉजी में विस्तार के साथ-साथ अपने पोर्टफोलियो में प्रॉफिटेबिलिटी और कर्ज प्रबंधन को कैसे संतुलित करता है। TCS जैसे महत्वपूर्ण स्टेकहोल्डर्स पर एनालिस्ट का सेंटीमेंट एक की इंडिकेटर होगा, हालाँकि ग्रुप की स्ट्रैटेजी और गवर्नेंस पर व्यापक चिंताएं व्यक्तिगत कंपनी के प्रदर्शन पर हावी हो सकती हैं।