सुप्रीम कोर्ट ने Adani Group द्वारा Jaiprakash Associates Ltd (JAL) के अधिग्रहण पर लगे स्टे (stay) को हटाने से मना कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि इस जटिल मामले का फैसला अब नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ही करेगा। यह फैसला JAL के मालिकाना हक के सवाल को फिलहाल अनिश्चितता में डालता है, जबकि कोर्ट ने JAL की मॉनिटरिंग कमेटी को NCLAT के फैसले से पहले कोई बड़ा कदम उठाने से रोक दिया है।
बिड वैल्यू का टकराव: कौन ज्यादा कीमती?
पूरा विवाद Adani Enterprises और Vedanta Ltd की तरफ से पेश की गई अलग-अलग बोलियों को लेकर है। JAL के क्रेडिटर्स कमेटी ने Adani की ₹14,535 करोड़ की योजना को मंजूरी दी थी, जिसे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने भी हरी झंडी दे दी थी। लेकिन Vedanta का दावा है कि उसकी ₹17,926 करोड़ (ग्रॉस वैल्यू) और ₹12,505 करोड़ (नेट प्रेजेंट वैल्यू) की ऑफर वैल्यू कहीं ज्यादा है। Vedanta ने आरोप लगाया है कि क्रेडिटर्स कमेटी ने इस ज्यादा वैल्यू को नजरअंदाज किया और प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी।
हालांकि, क्रेडिटर्स कमेटी ने Adani की बिड को तरजीह देने की वजह बताई है – Adani की बिड में ज्यादा फ्रंट-एंड कैश और सिर्फ दो साल में भुगतान का वादा है, जबकि Vedanta का प्लान पांच साल का है। इससे JAL पर लगे ₹57,000 करोड़ से ज्यादा के भारी कर्ज से जूझ रहे लेंडर्स (lenders) को जल्दी और ज्यादा निश्चितता के साथ पैसा वापस मिलने की उम्मीद है। सुप्रीम कोर्ट का NCLAT को फैसला सुनाने का निर्देश यह दर्शाता है कि वह इस तरह के जटिल वैल्यूएशन (valuation) और दिवाला (insolvency) मामलों को सुलझाने के लिए NCLAT को बेहतर मंच मानता है।
मार्केट में Adani और Vedanta का दबदबा
यह अधिग्रहण की लड़ाई ऐसे समय में हो रही है जब भारतीय एमएंडए (M&A) मार्केट में तेजी देखी जा रही है। Adani Group इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट्स और सीमेंट सेक्टर में तेजी से विस्तार कर रहा है, जिसकी मार्केट कैप करीब ₹2,34,768.33 करोड़ है। वहीं, Vedanta, जो माइनिंग और मेटल्स सेक्टर की बड़ी कंपनी है, उसकी मार्केट कैप लगभग ₹2,68,956 करोड़ है और वह भी रणनीतिक ग्रोथ चाहती है। रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में फंसे हुए प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ी डीलें आम हैं, लेकिन हाल के दिनों में कंपनियां ज्यादा सेलेक्टिव हो गई हैं।
कानूनी लड़ाई और सिस्टम पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केस को NCLAT वापस भेजना यह साफ करता है कि JAL की मालिकाना हक की लड़ाई अभी लंबी चलेगी। Vedanta की तरफ से जारी चुनौती यह सवाल खड़े करती है कि क्या भारत की दिवाला समाधान प्रणाली (insolvency resolution system) ऐसे मामलों में सबसे अच्छी वैल्यू हासिल करने के लक्ष्य को प्राप्त कर पा रही है, या फिर कम जोखिम वाले और जल्दी निपटान वाले प्रस्तावों को प्राथमिकता दी जा रही है। यह विवाद भविष्य में ऐसी डिस्ट्रेस्ड एसेट्स (distressed assets) की बिक्री को प्रभावित कर सकता है। JAL के लिए यह लंबी कानूनी प्रक्रिया ऑपरेशनल और फाइनेंशियल अनिश्चितता पैदा कर रही है, जो उसके रियल एस्टेट, सीमेंट प्लांट और हॉस्पिटैलिटी जैसी संपत्तियों को प्रभावित कर सकती है।