स्टील मिनिस्ट्री ने सरकारी टेंडर्स के लिए '50% डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन' (DVA) नियम को बदलकर अब 'मेल्ट एंड पोर' का नया और सख्त नियम लागू कर दिया है। यह नियम अगस्त 2026 से प्रभावी होगा, जिसके तहत सरकारी खरीद के लिए स्टील को भारत में ही मेल्ट और कास्ट (पिघलाकर ढालना) करना अनिवार्य होगा। यह कदम बड़े घरेलू स्टील उत्पादकों को फायदा पहुंचाएगा, लेकिन छोटे सप्लायर्स और ट्रेडर्स के लिए अनुपालन का बोझ और मार्जिन पर दबाव बढ़ा सकता है।
नई नीति का ऐलान: 'मेल्ट एंड पोर' का कड़ा फरमान
मिनिस्ट्री ऑफ स्टील ने सरकारी प्रोजेक्ट्स में स्टील उत्पादों की खरीद के तरीके में एक बड़ा बदलाव किया है। नोटिफिकेशन G.S.R. 720(E) के तहत, अब '50% डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन' (DVA) की पुरानी शर्त को हटाकर 'मेल्ट एंड पोर' का नया नियम लागू किया गया है। इस कड़े नियम के अनुसार, अब फ्लैट-रोल्ड स्टील, बार, रॉड और इलेक्ट्रिकल स्टील जैसे स्टील उत्पादों को घरेलू स्तर पर निर्मित तभी माना जाएगा जब उन्हें पूरी तरह से भारत में ही मेल्ट और कास्ट किया गया हो।
घरेलू उत्पादकों को मिलेगी सीधी मज़दूबती
इस पॉलिसी का मुख्य मकसद सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में इंपोर्टेड स्टील पर निर्भरता कम करना और सरकारी इंसेंटिव स्कीम्स का फायदा सीधे लोकल मैन्युफैक्चरर्स को पहुंचाना है। बड़े और इंटीग्रेटेड डोमेस्टिक स्टील उत्पादकों के लिए यह कदम एक बड़ी बढ़त साबित होगा। सरकार उन ट्रेडर्स पर नकेल कस रही है जो बाहर से स्टील इंपोर्ट करके, थोड़ी-बहुत प्रोसेसिंग के बाद उसे 'डोमेस्टिक' बताकर बेचते थे। अब भारतीय मिल्स के लिए बाजार का दायरा बढ़ेगा।
छोटे कारोबारियों के लिए बढ़ी मुश्किलें
हालांकि, इस नए नियम से माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज (MSME) सप्लायर्स और ट्रेडर्स के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। कई छोटे प्लेयर्स पहले विदेशों से स्टील मंगाकर, उसे फिनिशिंग का काम देकर सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में सप्लाई करते थे। अब उन्हें एक बड़ी अनुपालन बाधा का सामना करना पड़ रहा है। यदि वे किफायती दामों पर स्थानीय स्तर पर निर्मित स्टील नहीं खरीद पाते, तो उनके मुनाफे पर सीधा असर पड़ सकता है। साथ ही, इन छोटी कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन प्रक्रियाओं में बड़ा बदलाव लाना होगा ताकि वे नए ओरिजिन (उत्पत्ति) नियमों का पालन कर सकें, जिससे उनके ऑपरेशनल खर्चे बढ़ जाएंगे।
कुछ उत्पादों को मिली छूट
'मेल्ट एंड पोर' का नियम वैसे तो ज्यादातर पर लागू होगा, लेकिन सरकार ने कुछ एक्सेप्शन्स (छूट) को बरकरार रखा है ताकि प्रोजेक्ट्स में रुकावट न आए। रेलवे कोचेस, वैगन्स और कुछ खास तरह के स्टील ट्यूब्स और पाइप्स अभी भी पुरानी 50% DVA शर्त के तहत ही आएंगे। यह बात इन्वेस्टर्स और सप्लायर्स के लिए अहम है क्योंकि हर प्रोडक्ट कैटेगरी के लिए रेगुलेटरी बोझ अलग-अलग होगा।
सप्लाई चेन पर नज़र
ऑपरेशनल रिस्क पर भी नज़र रखनी होगी। अगर कुछ खास तरह के स्पेशलाइज्ड या हाई-ग्रेड स्टील की डोमेस्टिक प्रोडक्शन कैपेसिटी अचानक बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं निकली, तो सरकारी प्रोजेक्ट्स में देरी या लागत बढ़ने की आशंका है। हालांकि इस पॉलिसी का मकसद डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है, लेकिन बाजार इस बात पर नज़र रखेगा कि क्या भारतीय स्टील उत्पादक, खास ग्रेड्स के उत्पादन को बिना सप्लाई चेन में अड़चन पैदा किए बढ़ा पाएंगे।
निवेशकों के लिए क्या है अहम?
इन्वेस्टर्स के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि छोटे स्टील प्रोसेसर के मार्जिन में क्या बदलाव आता है और बड़े इंटीग्रेटेड स्टील मैन्युफैक्चरर्स इस बढ़ी हुई डोमेस्टिक डिमांड का कितना फायदा उठा पाते हैं। साथ ही, अगर किसी इंडस्ट्री को खास रॉ मैटेरियल स्थानीय स्तर पर मिलने में दिक्कत आती है, तो वे मिनिस्ट्री से क्या स्पष्टीकरण या छूट मांगते हैं, इस पर भी बाजार की नज़र रहेगी।
