Skipper Limited का लक्ष्य 2030 तक दुनिया की सबसे बड़ी ट्रांसमिशन टावर बनाने वाली कंपनी बनना है। कंपनी ने **6,00,000 टन** की प्रोडक्शन कैपेसिटी का लक्ष्य रखा है और उसके पास **₹10,000 करोड़** से ज्यादा का रिकॉर्ड ऑर्डर बुक मौजूद है।
आक्रामक विस्तार की रणनीति
Skipper Limited ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को तेजी से बढ़ाने का प्लान बनाया है। चालू फाइनेंशियल ईयर के अंत तक कंपनी 4,50,000 टन की प्रोडक्शन कैपेसिटी हासिल करने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए बंगाल स्थित मौजूदा प्लांट में ₹250 करोड़ का निवेश किया जा रहा है। साथ ही, एक्सपोर्ट को मजबूती देने के लिए कंपनी भारत के पश्चिमी तट पर एक नया मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की योजना बना रही है, जिस पर ₹500 करोड़ का अतिरिक्त निवेश होने की उम्मीद है।
ग्लोबल मार्केट और डिमांड
ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और फिलीपींस जैसे देशों में कंपनी अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन और डेटा सेंटर्स की बढ़ती मांग ने कंपनी के लिए नए दरवाजे खोले हैं। कंपनी का टर्नओवर FY26 में ₹5,552 करोड़ रहा है, जबकि एक्सपोर्ट ऑर्डर्स के इस साल के अंत तक ₹1,500 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
इतने बड़े पैमाने पर कैपेक्स (Capex) और निवेश का असर कंपनी के कैश फ्लो पर दिख सकता है। KEC International और Kalpataru Projects International जैसी कंपनियों की तरह, Skipper का परफॉर्मेंस भी स्टील की कीमतों पर निर्भर करता है। अगर स्टील के दाम बढ़ते हैं और कंपनी इसे ग्राहकों पर नहीं डाल पाती, तो प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। निवेशकों को कंपनी के डेट मैनेजमेंट और ऑर्डर्स के रेवेन्यू में बदलने की रफ्तार पर पैनी नजर रखनी होगी।
