SAIL ने ऑस्ट्रेलिया से आने वाले कोकिंग कोल (Coking Coal) पर निर्भरता कम करने के लिए मंगोलिया से मंगवाए गए सैंपल का परीक्षण शुरू कर दिया है। निवेशकों के लिए अब बड़ी चुनौती यह देखना है कि क्या लॉजिस्टिक लागत कम होने से स्टील उत्पादन सस्ता हो पाएगा।
क्या है पूरा मामला?
सरकारी स्टील दिग्गज Steel Authority of India (SAIL) अपनी रॉ मटीरियल सोर्सिंग को डायवर्सिफाई करने की रणनीति पर काम कर रही है। कंपनी ने हाल ही में मंगोलिया से 1 मीट्रिक टन का कोकिंग कोल सैंपल एयरलिफ्ट किया है ताकि यह चेक किया जा सके कि क्या यह भारत में स्टील बनाने के लिए उपयुक्त है।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
स्टील बनाने में कोकिंग कोल का सबसे बड़ा रोल होता है, जो कुल प्रोडक्शन कॉस्ट का करीब 40% हिस्सा है। फिलहाल भारत अपनी 95% कोकिंग कोल जरूरतों को आयात (Import) के जरिए पूरा करता है, जिसमें से आधे से ज्यादा हिस्सा अकेले ऑस्ट्रेलिया से आता है। ऑस्ट्रेलिया में किसी भी तरह की प्राइस वोलेटिलिटी का सीधा असर SAIL जैसे भारतीय स्टील उत्पादकों के नेट प्रॉफिट पर पड़ता है।
लॉजिस्टिक्स की चुनौती
मंगोलिया चारों तरफ से जमीन से घिरा (Landlocked) देश है, जिसकी सीमाएं चीन और रूस से मिलती हैं। यहां से भारत तक कोयला लाना ऑस्ट्रेलिया के समुद्री रूट की तुलना में काफी महंगा और जटिल है। भू-राजनीतिक (Geopolitical) कारणों से चीन के रास्ते पर विचार करना मुश्किल है, इसलिए रूस के रास्ते पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जो काफी लंबा और महंगा हो सकता है।
निवेशकों के लिए टेकअवे
निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या मंगोलियाई कोल की 'लैंडेड कॉस्ट' (Landed Cost) ऑस्ट्रेलियाई कोल के बराबर या उससे सस्ती पड़ती है। अगर ट्रांसपोर्ट की लागत बहुत ज्यादा रही, तो यह कदम मार्जिन के लिए फायदेमंद साबित नहीं होगा। फिलहाल कंपनी के मैनेजमेंट की कमेंट्री और भविष्य की सप्लाई डील्स पर निवेशकों की नजरें टिकी रहेंगी।
