इस्पात मंत्रालय ने सरकारी कंपनियों SAIL और NMDC को विदेशों में कोयला और लाइमस्टोन की खदानें खरीदने का निर्देश दिया है। इस कदम का मकसद रॉ मटीरियल के लिए **85-90%** की आयात निर्भरता को कम करना और प्रोडक्शन कॉस्ट को स्थिर रखना है।
इस्पात मंत्रालय ने सरकारी दिग्गज कंपनियों Steel Authority of India Ltd (SAIL) और National Mineral Development Corporation (NMDC) को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सक्रिय रूप से खनिज संपत्तियों को सुरक्षित करने का निर्देश दिया है। सरकार का यह कदम भारत के स्टील सेक्टर के लिए एक सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने की दिशा में उठाया गया है।
कच्चा माल और आयात पर निर्भरता
भारतीय स्टील उत्पादकों के लिए मुनाफे का सबसे बड़ा गणित कच्चे माल की कीमत पर टिका है। फिलहाल, भारत अपनी कोकिंग कोल जरूरतों का 85% से 90% हिस्सा ऑस्ट्रेलिया और मोजाम्बिक जैसे देशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय कंपनियों पर पड़ता है। अब ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और अफ्रीका में अपनी खदानें होने से कंपनियों को लागत में स्थिरता मिलेगी। इस मुहिम को 'MMDR अमेंडमेंट एक्ट 2026' का भी समर्थन प्राप्त है, जो माइनिंग प्रोजेक्ट्स को अधिक फिस्कल सर्टेंटी देता है।
NMDC का विविधीकरण प्लान
NMDC के लिए यह निर्देश उसके लॉन्ग-टर्म रोडमैप के अनुरूप है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक अपनी कुल रेवेन्यू का 20% हिस्सा आयरन ओर के अलावा निकल, लिथियम और कॉपर जैसे खनिजों से प्राप्त करना है। यह बदलाव उसे आयरन ओर की कीमतों के उतार-चढ़ाव के जोखिम से बचाएगा।
निवेश का जोखिम (Risks for Investors)
हालांकि यह रणनीति सप्लाई सिक्योरिटी के लिए अच्छी है, लेकिन विदेशी खदानों का संचालन अपने साथ कई जटिलताएं भी लाता है। इसमें रेगुलेटरी चुनौतियां, जियोपॉलिटिकल रिस्क और भारी-भरकम कैपिटल एक्सपेंडिचर शामिल हैं। यदि इन अधिग्रहणों के लिए कंपनियों को कर्ज लेना पड़ा, तो उनके डेट-टू-इक्विटी रेशियो पर दबाव बढ़ सकता है। अक्टूबर 2026 की शुरुआत में NMDC का शेयर लगभग ₹74.64 के आसपास कारोबार कर रहा था, जिस पर फिलहाल ग्लोबल मार्केट और एफआईआई (FII) आउटफ्लो का दबाव है। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर होंगी कि ये अधिग्रहण कब तक ऑपरेशनल होते हैं और इनका फंडिंग स्ट्रक्चर क्या होगा।
