सरकारी खजाने से विकास को रफ्तार
सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) ने कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) के मोर्चे पर कमाल का प्रदर्शन किया है। फाइनेंशियल ईयर के दसवें महीने तक, इन कंपनियों का कुल खर्च लगभग ₹7.40 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह उनके रिवाइज्ड कलेक्टिव टारगेट ₹7.47 लाख करोड़ का 99% है। बता दें कि पहले यह टारगेट ₹7.85 लाख करोड़ रखा गया था, जिसे बाद में घटाकर ₹7.47 लाख करोड़ किया गया था। यह दिखाता है कि सरकार इकोनॉमी को बूस्ट देने के लिए पब्लिक इन्वेस्टमेंट पर कितना जोर दे रही है।
कई बड़ी सरकारी कंपनियों ने तो अपने इंडिविजुअल Capex टारगेट को पार भी कर लिया है। NLC India Limited, Hindustan Petroleum Corporation (HPCL), और NTPC Limited जैसी कंपनियां अपने सालाना लक्ष्यों से आगे निकल गई हैं। नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने तो अपने टारगेट का 120% खर्च कर दिया है, वहीं रेलवे बोर्ड 90% के लक्ष्य तक पहुंच गया है। फरवरी महीने में अकेले ₹72,000 करोड़ से ज्यादा का आउटले देखा गया, जो पिछले तीन महीनों में सबसे ज्यादा है। इससे प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन में तेजी का साफ संकेत मिलता है।
प्राइवेट इन्वेस्टमेंट का सुस्त रफ्तार
सरकारी कंपनियों के इस जोरदार Capex पुश के विपरीत, प्राइवेट सेक्टर का इन्वेस्टमेंट प्लान कमजोर पड़ता दिख रहा है। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के एक फोरवर्ड-लुकिंग सर्वे के अनुसार, इस फाइनेंशियल ईयर में प्राइवेट Capex में 25% की गिरावट आने का अनुमान है। पिछले साल जहां यह ₹6.56 लाख करोड़ था, वहीं इस साल इसके घटकर ₹4.88 लाख करोड़ रहने की उम्मीद है।
हालांकि, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की एक रिपोर्ट में मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स और इंटरेस्ट रेट में संभावित कटौती के चलते FY26 में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में 21.5% बढ़कर ₹2.67 लाख करोड़ होने का अनुमान लगाया गया है। लेकिन फिलहाल, प्राइवेट सेक्टर काफी सावधानी बरत रहा है। ऐसे में, इकोनॉमिक मोमेंटम और जॉब क्रिएशन को बनाए रखने का दारोमदार सरकारी खर्च पर ही टिका है, जैसा कि पिछले कुछ सालों से देखने को मिल रहा है।
सेक्टर-वाइज चाल और चुनौतियां
CPSEs के मजबूत प्रदर्शन में एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का बड़ा योगदान है। एनर्जी कंपनियां इस Capex ड्राइव में सबसे आगे रही हैं। सरकारी संस्थाओं जैसे NHAI और रेलवे बोर्ड का प्रदर्शन इंफ्रास्ट्रक्चर के अहम रोल को दिखाता है। रेलवे ने अपने रिवाइज्ड एस्टिमेट्स का 89% और रोड्स ने 86% हासिल किया है। सरकार की नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (NIP) जैसी पहलों के चलते इंफ्रा सेक्टर में लगातार ग्रोथ की उम्मीद है, और यह 2025 तक ₹5.31 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। हालांकि, लैंड एक्विजिशन में देरी और रेगुलेटरी हर्डल्स जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं, भले ही नई टेक्नोलॉजी और PPP मॉडल एफिशिएंसी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
वैल्युएशन और पिछला रिकॉर्ड
इस Capex ड्राइव में शामिल प्रमुख CPSEs के वैल्युएशन प्रोफाइल अलग-अलग हैं। मार्च 2026 की शुरुआत तक, NTPC Ltd. का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो लगभग 13.82 से 15.9 के बीच रहा, जिसकी मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹3.69 लाख करोड़ है। NLC India Ltd. का P/E रेश्यो 11.0 से 13.21 के बीच, ₹35.53 लाख करोड़ के करीब मार्केट कैप के साथ, कुछ ज्यादा कंजर्वेटिव है। Hindustan Petroleum Corporation (HPCL) का P/E रेश्यो काफी कम, 5.6 से 8.27 के बीच है, और इसकी मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब ₹86,000-₹99,000 करोड़ है।
मार्च 2025 में NTPC का शेयर लॉन्ग-टर्म प्रेशर के बाद शॉर्ट-टर्म में बढ़ा था, जो ₹311-₹342 के आसपास ट्रेड कर रहा था। HPCL भी मार्च 2025 की शुरुआत में ₹339 के करीब था, इसी अवधि में इसने ₹287.55 का 52-वीक लो भी छुआ था। पिछले साल भी ऐसी ही Capex खबरों पर मार्केट की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि निवेशकों का ध्यान एग्जीक्यूशन और ब्रॉडर इकोनॉमिक ट्रेंड्स पर रहता है जो इन लार्ज-कैप एंटिटीज को प्रभावित करते हैं।
चिंताओं वाली बातें (The Forensic Bear Case)
इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ाने के लिए पब्लिक सेक्टर Capex पर भारी निर्भरता, भले ही शॉर्ट-टर्म में प्रभावी हो, लेकिन लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी और एफिशिएंसी पर सवाल खड़े करती है। प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में गिरावट अंडरलाइंग इश्यूज जैसे कमजोर डिमांड, जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं या फिर पब्लिक स्पेंडिंग के कारण प्राइवेट पार्टिसिपेशन हतोत्साहित होने (crowding-out effect) का संकेत देती है।
इसके अलावा, कच्चे माल और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन कॉस्ट पर इन्फ्लेशनरी प्रेशर इन बड़े प्रोजेक्ट्स के बजट को प्रभावित कर सकता है, जिससे मार्जिन और अल्टीमेट रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट पर असर पड़ सकता है। NLC India ने भले ही भारी Capex प्लान किया है, लेकिन मैनेजमेंट ने डी-लेवरेजिंग पर भी फोकस किया है। लॉन्ग-टर्म चैलेंज एसेट-क्रिएशन फेज से सिस्टम एफिशिएंसी और रेजिलिएंस पर फोकस करने वाले फेज में ट्रांजिशन करने का है, जैसा कि इंडस्ट्री ऑब्जर्वर्स ने भी कहा है। इन पब्लिक इन्वेस्टमेंट्स की इफेक्टिवनेस इस बात पर निर्भर करेगी कि वे प्राइवेट सेक्टर की एक्टिविटी को केवल सब्स्टीट्यूट करने के बजाय उसे स्टिम्युलेट कर पाते हैं या नहीं।
**आगे का रास्ता
एनालिस्ट्स का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर ग्रोथ का एक अहम ड्राइवर बना रहेगा, जिसमें सरकारी खर्च की भूमिका अहम होगी। यूनियन बजट 2026-27 में भी इस फोकस को बनाए रखने की उम्मीद है, जिसमें फिस्कल डिसिप्लिन के साथ Capex मोमेंटम को बैलेंस करने की कोशिश की जा सकती है।
हालांकि, CPSE Capex का इमीडिएट आउटलुक मजबूत दिख रहा है, लेकिन इस ग्रोथ की सस्टेनेबिलिटी प्राइवेट सेक्टर के इन्वेस्टमेंट में रिकवरी और बदलते इकोनॉमिक कंडीशंस के बीच प्रोजेक्ट्स के इफेक्टिव एग्जीक्यूशन पर निर्भर करेगी। इन पब्लिक सेक्टर दिग्गजों के परफॉर्मेंस पर बारीकी से नजर रखी जाएगी, जो भारत की ब्रॉडर इकोनॉमिक हेल्थ और इन्वेस्टमेंट क्लाइमेट के इंडिकेटर्स होंगे।