भारतीय पावर इक्विपमेंट स्टॉक्स जैसे CG Power और Siemens पर आज दबाव देखा गया। सरकार ने चार चीनी कंपनियों को डोमेस्टिक बिड्स में हिस्सा लेने की इजाजत दे दी है। हालांकि, एनालिस्ट्स का मानना है कि इसका असर सीमित रह सकता है।
चीनी कंपनियों की एंट्री से मचा हड़कंप
आज शेयर बाजार में भारतीय पावर इक्विपमेंट कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। CG Power, Siemens, Hitachi Energy India, और GE Vernova जैसे बड़े नामों के स्टॉक्स नीचे आते दिखे। यह गिरावट सरकार के एक नए फैसले के बाद आई है, जिसमें चार चीनी कंपनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट होने पर डोमेस्टिक पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन टेंडर्स में बोली लगाने की अनुमति दी गई है।
बाजार की चिंताएं और असलियत
निवेशकों को डर है कि चीनी कंपनियों के आने से घरेलू निर्माताओं के लिए कॉम्पिटिशन बढ़ेगा, जिससे उनके मुनाफे और मार्केट शेयर पर असर पड़ सकता है। पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर भारत में बड़े पैमाने पर ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड के कारण तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में किसी भी नए कॉम्पिटिटर का आना, चाहे वह सीमित ही क्यों न हो, आक्रामक प्राइसिंग स्ट्रेटेजी की चिंताएं बढ़ा सकता है।
कितना गंभीर है खतरा?
हालांकि, कई एनालिस्ट्स का मानना है कि इस डर का असर ज्यादा हो सकता है। Nomura के अनुसार, बाजार की यह प्रतिक्रिया जरूरत से ज्यादा हो सकती है। इन चार चीनी कंपनियों के लिए छूट का दायरा बहुत सीमित है और ये कंपनियां सरकारी टेंडर्स के लिए आवश्यक कड़े टेक्निकल, फाइनेंशियल और एग्जीक्यूशन स्टैंडर्ड्स के अधीन रहेंगी। ऐतिहासिक रूप से, Power Grid Corporation of India (PGCIL) के टेंडर्स में चीनी फर्मों की हिस्सेदारी काफी कम रही है, जो प्रतिबंधों से पहले भी लगभग 9% थी।
कॉम्पिटिशन का सही आकलन
Macquarie की रिसर्च से पता चलता है कि इन चार कंपनियों में से केवल TBEA Energy के पास ही वर्तमान में भारत में महत्वपूर्ण मैन्युफैक्चरिंग क्षमता सक्रिय है। बाकी तीन कंपनियों की फिजिकल प्रेजेंस काफी कम बताई जा रही है। इसके अलावा, भारतीय पावर इक्विपमेंट निर्माता बड़े विस्तार चक्रों के बीच में हैं। ये कंपनियां देश की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए अगले दो से तीन वर्षों में अपनी क्षमता को तेजी से बढ़ा रही हैं। Jefferies के एनालिस्ट्स का कहना है कि ग्रिड इक्विपमेंट की मांग अगले कई सालों तक सप्लाई से काफी आगे रहने की उम्मीद है, इसलिए घरेलू खिलाड़ियों को मजबूत ऑर्डर इनफ्लो और स्थिर प्राइसिंग पावर बनाए रखने की संभावना है।
अब निवेशक इस बात पर नजर रख रहे हैं कि ये कंपनियां आने वाली तिमाहियों में अपने ऑर्डर बुक्स और कैपेसिटी यूटिलाइजेशन को कैसे मैनेज करती हैं। उद्योग के लिए मुख्य कारक यह होगा कि क्या घरेलू निर्माता सप्लाई-डिमांड गैप से आगे रहने के लिए समय पर अपनी विस्तार योजनाओं को पूरा कर पाते हैं। सरकार का यह कदम विशेष रूप से स्थानीय सुविधाओं वाली फर्मों के लिए है, और ऐसी नीतियों की अस्थायी प्रकृति दीर्घकालिक प्रोजेक्ट प्लानिंग के लिए अवलोकन का एक बिंदु बनी हुई है।
