Polycab India की रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू वायर्स और केबल्स सेक्टर साल 2030 तक **₹1.7 लाख करोड़** तक पहुंच सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर और इलेक्ट्रिफिकेशन की बढ़ती मांग के बीच कंपनियां अब कच्चे माल के जोखिम को कम करने के लिए अपनी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को बढ़ा रही हैं।
देश का वायर्स और केबल्स सेक्टर तेजी से ग्रोथ के दौर में है। अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2030 तक यह मार्केट ₹1.7 लाख करोड़ के स्तर को छू लेगा। Polycab India के अनुसार, यह उछाल केवल पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से नहीं, बल्कि डेटा सेंटर्स, 5G रोलआउट और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) चार्जिंग जैसे नए सेक्टर्स की बढ़ती जरूरतों से आ रहा है।
कच्चे माल का मैनेजमेंट और मार्जिन
इस ग्रोथ के साथ ही कंपनियों के सामने चुनौती भी है क्योंकि कॉपर और एल्युमीनियम जैसे कच्चे माल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव बना रहता है। अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को बचाने के लिए कंपनियां अब मैन्युफैक्चरिंग चेन पर बेहतर कंट्रोल कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर, Polycab अब कॉपर के बजाय एल्युमीनियम-बेस्ड प्रोडक्ट्स पर स्विच करने की फ्लेक्सिबिलिटी का इस्तेमाल कर रही है, ताकि कीमतों की अस्थिरता का सीधा असर मुनाफे पर न पड़े।
कंपनियों का भारी भरकम इन्वेस्टमेंट
वित्त वर्ष 2026 से 2030 के बीच अनुमानित ₹67,700 करोड़ की नई घरेलू मांग को पूरा करने के लिए इंडस्ट्री बड़े पैमाने पर कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) कर रही है। Polycab, KEI Industries, RR Kabel, और Havells India जैसी दिग्गज कंपनियों ने कुल मिलाकर ₹12,500 करोड़ से ₹14,900 करोड़ तक का निवेश प्लान तैयार किया है। इसका मकसद अपनी कैपेसिटी बढ़ाना और उन हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स पर फोकस करना है, जो बेहतर मार्जिन देते हैं।
निवेशकों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि ये कंपनियां अपने प्रोजेक्ट्स को कितनी कुशलता से एग्जीक्यूट करती हैं और कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच अपने ऑपरेटिंग मार्जिन को कैसे मैनेज कर पाती हैं।
