Indian Paper Manufacturers Association ने सरकार से इमरजेंसी मदद मांगी है। बीते 60 दिनों में कोयले की कीमतों में **50%** का उछाल आया है, जिससे घरेलू पेपर उत्पादन पर संकट मंडराने लगा है।
देश के पेपर सेक्टर में एनर्जी कॉस्ट के बढ़ते ग्राफ ने इंडस्ट्री की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इंडियन पेपर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के मुताबिक, कैप्टिव पावर प्लांट्स में इस्तेमाल होने वाले कोयले के दाम पिछले दो महीनों में 50% तक बढ़ गए हैं। चूंकि पेपर बनाने की कुल लागत का लगभग 20% हिस्सा ऊर्जा पर खर्च होता है, इसलिए यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन (Operating Profit Margin) को निचोड़ रही है।
लॉजिस्टिक और सप्लाई चेन का संकट
महंगाई के साथ-साथ रेलवे रेक (Railway Rakes) की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कई पेपर मिलों के पास फ्यूल का स्टॉक बहुत कम बचा है, जिससे पावर जनरेशन में बाधा आ रही है। इंडस्ट्री ने अब सरकार से मांग की है कि पेपर मैन्युफैक्चरिंग को भी थर्मल पावर प्लांट्स की तरह प्राथमिकता दी जाए और 75% फ्यूल लिंकेज एग्रीमेंट्स का पालन सुनिश्चित किया जाए ताकि प्लांट चलते रहें।
इम्पोर्ट का डर और मार्जिन पर दबाव
एक तरफ लागत बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ सस्ते विदेशी पेपर के आयात ने कंपनियों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च को ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं, क्योंकि बाजार में सस्ते इम्पोर्टेड पेपर की भरमार है। विशेषकर मध्यम आकार की मिलों के लिए, जिनके पास बड़े खिलाड़ियों जैसी पूंजी नहीं है, यह स्थिति उनके अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।
निवेशकों के लिए संकेत
शेयर बाजार में लिस्टेड पेपर कंपनियों के निवेशकों को अब कंपनियों के अगले तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए। एनर्जी कॉस्ट में बढ़ोतरी का सीधा असर बॉटम लाइन पर पड़ता है। अगर सप्लाई चेन की अड़चनें दूर नहीं हुईं, तो भविष्य में आउटपुट में कटौती की आशंका बनी रहेगी। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां इन लागतों को पास ऑन कर पा रही हैं या फिर उनके मार्जिन में बड़ी गिरावट देखी जा रही है।
