सेक्टर में बड़ा बदलाव
Odisha के क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में बड़ा बदलाव आने वाला है। NETRA की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में जहां ये सेक्टर $8 अरब का था, वहीं 2032 तक इसके $18 से $20 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। ओडिशा सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए मिनरल प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग को चार गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।
2032 तक, कुल मिनरल वैल्यू में माइनिंग का हिस्सा 2025 के 40% से बढ़कर 50% हो जाएगा। वहीं, प्रोसेसिंग का हिस्सा 10% से बढ़कर 40% और मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा 5% से बढ़कर 30% हो जाएगा। यह सब राज्य की नीतियों और बड़े इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट (Industrial Investment) का नतीजा है। ओडिशा के पास लिथियम, ग्रेफाइट, वैनेडियम और कोबाल्ट समेत 30 से ज़्यादा क्रिटिकल मिनरल्स के भंडार हैं, जो इसे क्लीन एनर्जी (Clean Energy) के लिए एक अहम केंद्र बनाते हैं। राज्य 'रेयर अर्थ कॉरिडोर' (Rare Earth Corridor) जैसी पहलों से घरेलू सप्लाई चेन (Supply Chain) को मजबूत कर रहा है। ओडिशा के उद्योग सेक्टर की GVA (Gross Value Added) सालाना 5.36% की दर से बढ़ने की उम्मीद है, जो राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा है।
इन्वेस्टमेंट का गढ़ बनता ओडिशा
इस महत्वाकांक्षी ग्रोथ प्लान के चलते कई बड़ी कंपनियां ओडिशा में निवेश करने के लिए उत्साहित हैं। Tata Power, Himadri Speciality Chemicals, Hindalco और Luminous जैसी 10 से ज़्यादा इंडस्ट्रीज ने यहां बड़े मैन्युफैक्चरिंग निवेश का वादा किया है। राज्य की बेहतर पोर्ट कनेक्टिविटी (Port Connectivity) भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच आसान बनाती है। राज्य सरकार का '5J' (जल, जंगल, जमीन, जीव-जंतु, जन साधारण) विजन सस्टेनेबल डेवलपमेंट (Sustainable Development) पर ज़ोर देता है। केंद्र सरकार की नेशनल मिनरल पॉलिसी 2019 (National Mineral Policy 2019) और हाल ही में लॉन्च हुए नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन (National Critical Minerals Mission - NCMM) ने भी इस सेक्टर को और मजबूती दी है।
सेक्टर की चाल और कंपनियों का हाल
दुनिया भर में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (Electric Vehicles) और रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) की बढ़ती मांग के कारण क्रिटिकल मिनरल्स की ज़रूरत तेज़ी से बढ़ रही है। खास तौर पर लिथियम-आयन बैटरी (Lithium-ion Battery) की डिमांड 2025 से 2035 के बीच हर साल 10.6% की दर से बढ़ने का अनुमान है। इसी को देखते हुए लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे मिनरल्स की अहमियत बढ़ गई है।
इस सेक्टर की कुछ कंपनियों के हालिया मार्केट परफॉरमेंस (Market Performance) पर नज़र डालें तो:
- Tata Power का मार्केट कैप लगभग ₹1.20-1.21 ट्रिलियन है, और शेयर ₹374-378 के आसपास ट्रेड कर रहे हैं।
- Hindalco Industries का मार्केट कैप करीब ₹2.05-2.10 ट्रिलियन है, स्टॉक ₹914-935 पर है।
- Himadri Speciality Chemicals, जो बैटरी केमिकल्स बनाती है, का मार्केट कैप ₹24.5-25.1 अरब है और शेयर ₹487-490 के भाव पर चल रहे हैं।
आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा पॉलिसी के तहत 2030 तक इन मिनरल्स की मांग दोगुनी हो सकती है, और नेट-ज़ीरो (Net Zero) लक्ष्य हासिल करने की स्थिति में तो यह तीन गुना भी हो सकती है।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि, इस सेक्टर में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारत अपनी ज़रूरत के लगभग 95% क्रिटिकल मिनरल्स के लिए आयात पर निर्भर है। लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे ज़रूरी खनिजों के लिए तो यह निर्भरता 100% तक है। मिनरल प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग में चीन का दबदबा एक बड़ा भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risk) पैदा करता है।
भारत का मिनरल एक्सप्लोरेशन (Mineral Exploration) बजट वैश्विक स्तर पर सिर्फ 1.3% है, जबकि कनाडा (24%) और ऑस्ट्रेलिया (20%) जैसी देश कहीं ज़्यादा खर्च करते हैं। यह कम निवेश और लंबे प्रोजेक्ट साइकल (Project Cycle) नए खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी बाधा है। साथ ही, रेगुलेटरी अनिश्चितता (Regulatory Uncertainty) और स्थानीय समुदायों का विरोध भी चिंता का विषय है, जैसा कि नियामगिरी पहाड़ी मामले में देखा गया था। कुल मिलाकर, इस सेक्टर की सफलता डाउनस्ट्रीम यानी बैटरी और डिफेंस जैसे क्षेत्रों से मांग की गारंटी पर भी टिकी हुई है।
आगे की राह
कुल मिलाकर, ओडिशा के क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है। सरकारी नीतियों और वैश्विक मांग से इसे बल मिल रहा है। राज्य का वैल्यू चेन (Value Chain) में ऊपर जाना और NCMM जैसी राष्ट्रीय पहलों से भारत एक आत्मनिर्भर उत्पादक बनने की ओर बढ़ रहा है। कंपनियों के निवेश से सही मायनों में इस बदलते परिदृश्य का फायदा उठाने की उम्मीद है। हालांकि, वैश्विक सप्लाई चेन की मुश्किलों, भू-राजनीतिक जोखिमों और आयात पर निर्भरता को कम करने में सफलता ही इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने की कुंजी होगी। बता दें कि पूरे भारतीय क्रिटिकल मिनरल्स मार्केट के 2030 तक ₹1.2 लाख करोड़ (लगभग $15 अरब) के पार जाने का अनुमान है।