मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने भारत के लेदर और फुटवियर सेक्टर को एक गहरे संकट में डाल दिया है। इस क्षेत्र की अपनी सप्लाई चेन की तेल-आधारित कच्चे माल पर भारी निर्भरता अब भारी पड़ रही है। क्रूड ऑयल के दाम आसमान छूने से पॉलीयूरेथेन (PU), एथिलीन विनाइल एसीटेट (EVA) और रबर जैसे जरूरी इनपुट्स की लागत 40% से 60% तक बढ़ गई है। इसका सीधा मतलब है कि मैन्युफैक्चरर्स के लिए प्रोडक्शन कॉस्ट में औसतन 30% का इजाफा हुआ है।
इस लागत वृद्धि का असर सीधे तौर पर एक्सपोर्ट्स पर भी दिख रहा है। खाड़ी देशों में सर्विस सस्पेंड होने और फ्रेट रेट्स में 25% से ज्यादा की बढ़ोतरी के चलते वहां करीब $200 मिलियन के एक्सपोर्ट्स पर खतरा मंडरा रहा है। यूरोप जाने वाले शिपमेंट्स, जो भारत के लेदर और फुटवियर एक्सपोर्ट का लगभग आधा हिस्सा हैं, जहाजों के रूट बदलने के कारण 8-9 दिन की देरी का सामना कर रहे हैं। बढ़ी हुई LPG की कीमतें भी ऑपरेशनल खर्चों को और बढ़ा रही हैं।
यह संकट भारत की लेदर इंडस्ट्री की कुछ कमजोरियों को भी उजागर करता है। वियतनाम और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के पास ज्यादा इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन और विविध मैटेरियल सोर्सिंग की सुविधा है। वियतनाम में स्पेशलाइज्ड फैक्ट्री नेटवर्क और एफिशिएंट लॉजिस्टिक्स है, जबकि चीन अपनी स्केल और इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण आगे है। भारत की ताकत मटेरियल की जानकारी और कारीगरी में है, लेकिन इंडस्ट्री काफी बिखरी हुई है, खासकर अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में। इस बिखराव के कारण बड़े ऑर्डर्स को पूरा करने की क्षमता सीमित है, जो अमेरिका जैसे बड़े मार्केट में कॉम्पिटिशन करने में बाधा डालता है।
इस बढ़ती लागत का असर नॉन-लेदर फुटवियर सेगमेंट पर खास तौर पर पड़ रहा है। हरियाणा के बहादुरगढ़ जैसे प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब में कच्चे माल की कीमतें 50% से 70% तक बढ़ गई हैं, जिससे प्रोडक्शन लगभग 50% गिर गया है। इससे करीब ₹500 करोड़ के ऑर्डर खतरे में आ गए हैं। प्रोडक्शन के अलावा, कंज्यूमर डिमांड पर भी असर पड़ रहा है क्योंकि लोग आर्थिक अनिश्चितता के कारण लेदर जैकेट जैसी चीजें खरीदने में देरी कर सकते हैं, जिसका सीधा असर ट्रेड वॉल्यूम पर पड़ेगा। Kothari Industrial Corporation Ltd. जैसी कंपनियां, जो फर्टिलाइजर और फुटवियर जैसे विभिन्न सेक्टर्स में काम करती हैं, इस स्थिति से निपटने के लिए जटिल चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
सरकारी स्तर पर कुछ राहत के उपाय किए जा रहे हैं। सरकार ने 30 जून, 2026 तक चुनिंदा तेल-आधारित इनपुट्स पर इंपोर्ट ड्यूटी में छूट दी है। इसके अलावा, इंडियन फुटवियर एंड लेदर डेवलपमेंट प्रोग्राम (IFLDP) के तहत मार्च 2026 तक ₹1,700 करोड़ का फंड इंफ्रास्ट्रक्चर और इंसेंटिव के लिए आवंटित किया गया है। जनवरी 2026 से प्रभावी इंडिया-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) यूरोपियन यूनियन मार्केट में जीरो-ड्यूटी एक्सेस प्रदान करेगा, जिससे भारत को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले बेहतर कॉम्पिटिशन करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इंडस्ट्री की तेल डेरिवेटिव्स पर गहरी निर्भरता उसे भू-राजनीतिक घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है, जो ऐतिहासिक रूप से तेल की कीमतों को बढ़ाती हैं। एक स्थायी भविष्य के लिए वैकल्पिक मैटेरियल्स की ओर रणनीतिक बदलाव और ग्लोबल सप्लाई चेन में ज्यादा एकीकरण की जरूरत है ताकि बाहरी दबावों के खिलाफ मजबूती बनाई जा सके।