मेरठ अब एक बड़ा स्पोर्ट्स मैन्युफैक्चरिंग हब बन चुका है, जहां हजारों छोटी इकाइयों ने सालाना **₹975 करोड़** का एक्सपोर्ट हासिल किया है। ODOP और Khelo India जैसी सरकारी योजनाओं की मदद से यह सेक्टर क्रिकेट इक्विपमेंट से आगे बढ़कर अब जिम और बॉक्सिंग गियर जैसे ग्लोबल मार्केट में भी अपनी धाक जमा रहा है।
मेरठ अब सिर्फ क्रिकेट बैट के लिए नहीं, बल्कि एक मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस के तौर पर पहचाना जा रहा है। यहां का स्पोर्ट्स गुड्स सेक्टर सालाना ₹975 करोड़ का एक्सपोर्ट कर रहा है। आज मेरठ में बने हॉकी स्टिक्स, बॉक्सिंग ग्लव्स और कमर्शियल जिम इक्विपमेंट जर्मनी, इंग्लैंड, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे 5 महाद्वीपों के देशों में अपनी जगह बना चुके हैं।
ध्यान देने वाली बात (Market Insight)
इन्वेस्टर कम्युनिटी के लिए यह समझना जरूरी है कि यह कोई एक लिस्टेड कंपनी नहीं है, बल्कि 5,000 से 7,000 छोटी और मध्यम इकाइयों (MSMEs) का एक इंडस्ट्रियल क्लस्टर है। स्टॉक एक्सचेंज पर कोई भी 'Meerut Sports' नाम की कंपनी लिस्टेड नहीं है, इसलिए यह आंकड़ा पूरे सेक्टर के सामूहिक प्रदर्शन को दर्शाता है।
सरकारी योजनाओं का सपोर्ट
इस ग्रोथ में यूपी सरकार की 'One District One Product' (ODOP) स्कीम ने बड़ी भूमिका निभाई है। साथ ही, केंद्र की 'Khelo India' पहल ने घरेलू मांग को मजबूत किया है। सब्सिडी और बिना ब्याज वाले लोन के जरिए छोटी इकाइयों को मशीनरी अपग्रेड करने में मदद मिली है, जिससे वे इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा कर पा रही हैं।
चुनौतियां और जोखिम
ग्रोथ के बावजूद, इस सेक्टर के सामने कई चुनौतियां भी हैं:
- फ्रेगमेंटेशन (Fragmentation): हजारों छोटी इकाइयों के कारण किसी एक फर्म के पास भारी R&D या बड़े ग्लोबल ब्रांड मार्केटिंग में निवेश करने की क्षमता कम है।
- लॉजिस्टिक्स का मुद्दा: समुद्र तटीय इलाकों के मुकाबले मेरठ इनलैंड होने के कारण ट्रांसपोर्टेशन की लागत और डिलीवरी का समय अधिक होता है।
- ग्लोबल कॉम्पिटिशन: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यधिक मशीनीकृत प्रतिस्पर्धियों से कीमत के मामले में मुकाबला करना अभी भी इस सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
