Linde India Limited की 5 मार्च 2026 को हुई एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी जनरल मीटिंग (EGM) में शेयरधारकों ने कंपनी के एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए प्रस्तावित मटेरियल रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन्स (RPTs) के रेज़ोल्यूशन के खिलाफ 1,30,99,840 वोट पड़े, जबकि सिर्फ 15,79,994 वोट इसके पक्ष में आए। यह 89.24% का भारी विरोध था, जिसने शेयरहोल्डर गवर्नेंस पर एक बड़ी मोहर लगा दी।
असल में, Linde India ने अपने शेयरहोल्डर्स से फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए कुछ खास 'रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन्स' (RPTs) को मंजूरी देने की गुजारिश की थी। लेकिन, वोटिंग के नतीजों ने साफ कर दिया कि बहुसंख्यक शेयरहोल्डर्स इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे। प्रस्ताव के पक्ष में केवल 10.76% वोट आए, जबकि बाकी 89.24% वोट इसके खिलाफ पड़े। इसका सीधा मतलब है कि कंपनी द्वारा प्रस्तावित ये खास RPTs अब वैसे नहीं हो पाएंगे जैसा मैनेजमेंट चाहता था।
यह नतीजा शेयरहोल्डर्स के अधिकारों के मजबूत प्रदर्शन को दिखाता है और कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर चल रही चिंताओं को उजागर करता है। यह साफ संकेत है कि शेयरधारकों का एक बड़ा हिस्सा कंपनी के प्रस्तावित सौदों के साथ सहमत नहीं है। Linde India जैसी कंपनी के लिए, जिसके RPTs को लेकर रेगुलेटरी जांच का इतिहास रहा है, इस तरह की वोटिंग मैनेजमेंट और पब्लिक शेयरहोल्डर्स के बीच ट्रांसपेरेंसी और ट्रस्ट पर सवालिया निशान लगा सकती है।
Linde India, जो इंडस्ट्रियल गैस सेक्टर की एक बड़ी कंपनी है और ग्लोबल Linde plc का हिस्सा है, का इतिहास रेगुलेटरी जांच से जुड़ा रहा है, खासकर RPTs को लेकर। इसके पेरेंट, Linde AG और Praxair Inc. के 2018 में हुए मर्जर के बाद, Linde India और Praxair India एक ही ग्लोबल पेरेंट के अधीन अलग-अलग काम करने लगे, जिसने आर्म्स लेंथ ट्रांजैक्शन्स और माइनॉरिटी शेयरहोल्डर इंटरेस्ट पर सवाल खड़े किए थे। SEBI और सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने RPTs के 'मटेरियलिटी' (महत्व) की व्याख्या पर Linde India पर गौर किया है। SAT ने SEBI के इस रुख को बरकरार रखा था कि RPTs का मूल्यांकन कॉन्ट्रैक्ट-बाय-कॉन्ट्रैक्ट के बजाय एंटिटी-लेवल बेसिस पर होना चाहिए। गौर करने वाली बात यह है कि जून 2021 में भी शेयरहोल्डर्स ने ऐसे ही RPT प्रस्ताव को रिजेक्ट किया था।
तो अब क्या बदलेगा? सबसे बड़ा बदलाव यह है कि FY2025-26 के लिए प्रस्तावित मटेरियल RPTs तय योजना के मुताबिक नहीं हो पाएंगे। Linde India के मैनेजमेंट को इन खास ट्रांजैक्शन्स के लिए अपनी स्ट्रेटेजी पर फिर से विचार करना होगा। हो सकता है कि उन्हें रिवाइज़्ड टर्म्स पेश करने पड़ें, नए अप्रूवल मांगने पड़ें या फिर इन प्लांस को पूरी तरह से अबैंडन करना पड़े।
आगे क्या रिस्क हैं? RPTs पर शेयरहोल्डर्स की लगातार असहमति Linde India के लिए गवर्नेंस चैलेंजेस को बढ़ाती है। इससे रेगुलेटर्स और इन्वेस्टर्स की तरफ से स्क्रूटिनी और बढ़ सकती है। ऐसे में यह खतरा है कि भविष्य में होने वाले रिलेटेड पार्टी डीलिंग्स को भी वैसी ही आपत्ति का सामना करना पड़ सकता है, अगर वे सभी शेयरहोल्डर्स के बेस्ट इंटरेस्ट में न माने गए।
इंडस्ट्रियल गैस मार्केट में Linde India के मुख्य कम्पेटिटर्स Air Liquide India और INOX Air Products हैं। हालांकि ये कंपनियां भी एक जैसे रेगुलेटरी एनवायरनमेंट में काम करती हैं, लेकिन Linde India का SEBI और SAT के साथ RPT एग्रीगेशन और शेयरहोल्डर रिजेक्शन को लेकर खास इतिहास रहा है, जिसने इसे कॉर्पोरेट गवर्नेंस नैरेटिव में एक प्रमुख खिलाड़ी बनाया है। Praxair India, जो अब एक ही पेरेंट के अधीन है, इन RPTs की चर्चाओं में सेंट्रल रहा है।
अब इन्वेस्टर्स क्या देखेंगे? इन्वेस्टर्स इस बात पर नजर रखेंगे कि Linde India का मैनेजमेंट इस शेयरहोल्डर रिजेक्शन पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या वे रिवाइज़्ड RPTs पेश करते हैं। कंपनी की तरफ से रिलेटेड पार्टी डीलिंग्स को लेकर स्ट्रेटेजी और शेयरहोल्डर कंसर्न्स को एड्रेस करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में फ्यूचर कम्युनिकेशन्स पर बारीकी से नजर रखी जाएगी। Linde India की RPT प्रैक्टिसेस से संबंधित किसी भी रेगुलेटरी प्रोनाउंसमेंट या एक्शन पर नजर रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
