कोल्हापूर फाउंड्री क्लस्टर: ग्रीन एनर्जी अपनाने में बड़ी चुनौतियाँ, ऑटो कंपनियों की सप्लाई चेन पर असर

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
कोल्हापूर फाउंड्री क्लस्टर: ग्रीन एनर्जी अपनाने में बड़ी चुनौतियाँ, ऑटो कंपनियों की सप्लाई चेन पर असर

महाराष्ट्र के कोल्हापूर में छोटी और मध्यम आकार की फाउंड्रीज़ (foundries) ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ने में संघर्ष कर रही हैं। फंड की कमी और सौर ऊर्जा नीतियों में बदलाव के कारण ये कंपनियाँ अपने सस्टेनेबिलिटी (sustainability) लक्ष्यों को पूरा करने में दिक्कतें झेल रही हैं, जिसका असर बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों की सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

क्या हुआ?

महाराष्ट्र के कोल्हापूर में फाउंड्री क्लस्टर (foundry cluster) को क्लीनर एनर्जी (cleaner energy) की ओर बढ़ने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। राज्य और वैश्विक मानकों को पूरा करने के लिए एनर्जी एफिशिएंसी (energy efficiency) बढ़ाने और कार्बन उत्सर्जन (carbon emissions) को कम करने का दबाव तो है, लेकिन कई छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) के फाउंड्री मालिक इन अपग्रेड्स के लिए फंड जुटाने में जूझ रहे हैं। कुशल इंडक्शन फर्नेस (induction furnaces) लगाने और सोलर पावर (solar power) क्षमता स्थापित करने जैसे बदलावों की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है, जिसका मुख्य कारण वित्तीय योजनाओं (financial schemes) के बारे में जानकारी की कमी और बिजली नियमों (electricity regulations) की अनिश्चितता है।

सप्लाई चेन के लिए यह क्यों मायने रखता है?

कोल्हापूर भारत में मेटल कास्टिंग (metal casting) का एक अहम केंद्र है। यहाँ ऑटोमोटिव, कंस्ट्रक्शन और पावर जनरेशन जैसे प्रमुख उद्योगों के लिए पुर्जे बनाए जाते हैं। Tata Motors और Ashok Leyland जैसी बड़ी कंपनियाँ भी ऐसे वेंडरों (vendors) पर निर्भर हैं। जैसे-जैसे ये बड़ी ऑटोमोबाइल निर्माता कंपनियाँ कड़े सस्टेनेबिलिटी (sustainability) और नेट-ज़ीरो (net-zero) लक्ष्यों की ओर बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे उनके वेंडर नेटवर्क से भी ऐसे ही कदम उठाने की उम्मीद की जा रही है। यदि MSME फाउंड्रीज़ अपनी टेक्नोलॉजी को अपग्रेड नहीं कर पाती हैं, तो उन्हें अपने बड़े कॉर्पोरेट ग्राहकों (corporate clients) की बदलती गुणवत्ता (quality) और सस्टेनेबिलिटी (sustainability) की ज़रूरतों को पूरा करने में दिक्कत हो सकती है।

वित्तीय और नीतिगत बाधाएँ

इन फाउंड्री मालिकों के लिए सबसे बड़ी बाधा भारी अग्रिम लागत (upfront cost) है। हालाँकि स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (SIDBI) जैसी संस्थाएँ एनर्जी एफिशिएंसी (energy efficiency) और रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) को सपोर्ट करने के लिए 4E प्रोग्राम जैसी विशेष योजनाएँ चलाती हैं, लेकिन इनके बारे में जागरूकता (awareness) कम है। कई मालिक अभी भी ज़्यादा ब्याज दरों (interest rates) पर पारंपरिक बैंक लोन (bank loans) पर निर्भर हैं। इसके अलावा, महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (MERC) द्वारा हाल ही में सौर ऊर्जा बैंकिंग (solar energy banking) और ग्रिड सपोर्ट चार्जेस (grid support charges) के संबंध में की गई नीतिगत बदलावों (policy modifications) ने नए सौर निवेश (solar investments) के पे-बैक पीरियड (payback period) को बढ़ा दिया है। इन बदलावों ने वित्तीय अनिश्चितता (financial uncertainty) पैदा की है, जिससे ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर (green infrastructure) पर कैपिटल एक्सपेंडिचर (capital expenditure) को सही ठहराना मुश्किल हो गया है।

जोखिम और जमीनी हकीकत

इलेक्ट्रिफिकेशन (electrification) की ओर बदलाव पहले से ही चल रहा है, कई फाउंड्रीज़ कोयले से इलेक्ट्रिक फर्नेस (electric furnaces) की ओर बढ़ रही हैं। लेकिन, सिर्फ बिजली का उपयोग करना एनर्जी एफिशिएंट (energy efficient) होने जैसा नहीं है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स (industry experts) का कहना है कि मौजूदा परिचालन प्रथाओं (operational practices) और एनर्जी बचाने की क्षमता के बीच एक बड़ा गैप (gap) है। स्थिर सरकारी नीतियों (government policies) और स्पष्ट वित्तीय प्रोत्साहन (financial incentives) के बिना, डीकार्बोनाइजेशन (decarbonization) की गति धीमी रहने की संभावना है। व्यापक औद्योगिक क्षेत्र (industrial sector) के लिए, जोखिम यह है कि छोटे वेंडरों को बिजली की ज़्यादा लागत वहन करनी पड़े या वे अपने उपकरणों को आधुनिक बनाने में विफल रहें, जिससे परिचालन लागत (operational costs) बढ़ सकती है या सप्लाई में रुकावट (supply disruptions) आ सकती है।

निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

महाराष्ट्र में ऊर्जा और सौर नीतियों (energy and solar policies) में किसी भी तरह के और बदलाव पर नज़र रखना महत्वपूर्ण है, खासकर ग्रिड सपोर्ट चार्जेस (grid support charges) के संबंध में, क्योंकि यह सीधे तौर पर निर्माताओं के लिए रिन्यूएबल एनर्जी निवेश (renewable energy investments) की व्यवहार्यता (viability) को प्रभावित करता है। निवेशक यह भी देख सकते हैं कि क्या बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियाँ अपनी सप्लाई चेन को ग्रीन एनर्जी (green energy) में बदलने में मदद करने के लिए वेंडर-सपोर्ट प्रोग्राम (vendor-support programs) पेश करती हैं। अंत में, MSMEs के लिए ग्रीन फाइनेंस (green finance) तक पहुँच को सरल बनाने के निरंतर प्रयास इस औद्योगिक क्लस्टर (industrial cluster) के एनर्जी फुटप्रिंट (energy footprint) को कितनी जल्दी आधुनिक बनाया जा सकता है, इसका एक महत्वपूर्ण संकेतक होगा।

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