ऊर्जा सुरक्षा की नई राह
जम्मू और कश्मीर सरकार का 120 साल पुराने Mohra Power Project को फिर से शुरू करने का फैसला, उसकी व्यापक ऊर्जा सुरक्षा योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पहल अप्रैल 2025 में भारत द्वारा Indus Water Treaty (IWT) को निलंबित करने के बाद और भी सामरिक महत्व रखती है। ऐतिहासिक रूप से भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे को नियंत्रित करने वाली IWT को रोकने से इस क्षेत्र में जल संसाधनों के प्रबंधन का एक नया रास्ता खुलता है।
Mohra के पुनरुद्धार और अन्य जलविद्युत परियोजनाओं में तेज़ी लाने का यह संकेत, बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ावा देने और बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने के एक दृढ़ प्रयास को दर्शाता है। यह रणनीतिक बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र शासित प्रदेश का लक्ष्य 2035 तक अपनी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता को मौजूदा 3,540 MW से लगभग 11,000 MW तक तीन गुना करना है।
Mohra Project: इतिहास और तकनीकी पहलू
1905 में चालू हुआ Mohra Power Project, झेलम नदी (Jhelum River) पर उरी सेक्टर (Uri Sector) में स्थित भारत की अग्रणी जलविद्युत सुविधाओं में से एक है। मूल रूप से 5 MW क्षमता वाली यह परियोजना, 1992 में बाढ़ से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त होने के बाद इसकी क्षमता घटकर लगभग 3 MW रह गई थी, जिसके बाद इसे बंद कर दिया गया था।
इसकी एक अनूठी विशेषता 10 किलोमीटर से भी लंबी लकड़ी की जल-वाहिनी (water channel) है, जो शुरुआती इंजीनियरिंग की कुशलता को दर्शाती है। हालाँकि प्रस्तावित 10.5 MW क्षमता क्षेत्र की बिजली की कमी को पूरी तरह से हल नहीं करेगी, लेकिन इसके पुनरुद्धार का ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व बहुत अधिक है, जो कश्मीर की इंजीनियरिंग विरासत के एक हिस्से को संजोएगा। इसके नवीनीकरण, आधुनिकीकरण और संचालन की योजनाओं में सीमित टेंडर के ज़रिए एक ट्रांजेक्शन एडवाइज़र (transaction adviser) की नियुक्ति शामिल होगी।
J&K के महत्वाकांक्षी ऊर्जा लक्ष्य
J&K में लगभग 18,000 MW की अनुमानित जलविद्युत क्षमता है, जिसमें से लगभग 15,000 MW की पहचान की जा चुकी है। क्षेत्र की वर्तमान 3,540 MW की क्षमता, उसकी पहचानी गई क्षमता का केवल लगभग 24% है। सरकार की योजना इस अंतर को कई परियोजनाओं के विकास से पाटने की है, जिसमें चल रहे निर्माण और भविष्य की बोलियों से महत्वपूर्ण क्षमता मिलने की उम्मीद है।
Pakal Dul (1,000 MW), Kiru (624 MW), और Rattle (850 MW) जैसी परियोजनाएं उन्नत चरणों में हैं। 2035 तक 11,000 MW का लक्ष्य, J&K को एक ऊर्जा केंद्र बनाने की रणनीति को दर्शाता है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी और यह संभावित रूप से एक शुद्ध बिजली निर्यातक बन सकता है।
आगे की चुनौतियां
ऊर्जा के क्षेत्र में इस महत्वाकांक्षी दौड़ के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। Indus Water Treaty का निलंबन, भले ही नदी संसाधनों पर भारतीय नियंत्रण को बढ़ा सकता है, लेकिन भू-राजनीतिक अनिश्चितता और क्षेत्रीय स्थिरता व जल बंटवारे के सवाल खड़े करता है। इसके अलावा, हालिया हमलों के बाद इस क्षेत्र का इंफ्रास्ट्रक्चर सुरक्षा खतरों के प्रति संवेदनशील है।
जलवायु परिवर्तन एक और जोखिम है; अध्ययनों से पता चलता है कि झेलम नदी बेसिन में वर्षा पैटर्न और ग्लेशियरों के पिघलने की गति बदल सकती है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है और जलविद्युत के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। यह क्षेत्र उच्च भूकंपीय क्षेत्र में भी है, जो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए संरचनात्मक जोखिम पैदा करता है।
भविष्य की ओर
Mohra Power Project का पुनरुद्धार, अपनी क्षमता में छोटा होने के बावजूद, J&K की ऊर्जा लक्ष्यों को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता का एक प्रतीकात्मक संकेत है। भू-राजनीतिक आवश्यकताओं और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दृष्टि से प्रेरित जलविद्युत परियोजनाओं का त्वरित विकास, क्षेत्र के रणनीतिक फोकस को उजागर करता है।
हालांकि, इस व्यापक एजेंडे की सफलता जटिल भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने, सुरक्षा और पर्यावरणीय जोखिमों को कम करने, और संरचनात्मक व जलवायु अनिश्चितताओं के बीच बड़ी परियोजनाओं को कुशलतापूर्वक क्रियान्वित करने पर निर्भर करती है। ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि को क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक प्रगति के संकेतक के रूप में देखा जाएगा।