चीन ने टनल बोरिंग मशीन (TBM) के एक्सपोर्ट पर नए लाइसेंसिंग नियम लागू किए हैं, लेकिन भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए यह बड़ी चिंता की बात नहीं है।
चीन ने हाल ही में टनल बोरिंग मशीनों (TBM) के एक्सपोर्ट के लिए कड़े नियम लागू किए हैं, जो 18 नवंबर से प्रभावी हो गए हैं। हालांकि चीन ने इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दिया है, लेकिन भारत के बड़े मेट्रो और रेल प्रोजेक्ट्स पर इसका असर न के बराबर रहने की उम्मीद है, क्योंकि भारत की निर्भरता मुख्य रूप से यूरोपीय इंजीनियरिंग पर है।
जर्मन इंजीनियरिंग का दबदबा
भारत के इंफ्रा सेक्टर में जर्मन इंजीनियरिंग का खासा प्रभाव है। प्रमुख निर्माता Herrenknecht 2007 से ही चेन्नई में अपना प्रोडक्शन प्लांट चला रही है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में काम कर रही लगभग 50% TBM मशीनें जर्मन निर्मित हैं। हालांकि ये मशीनें चीन के मुकाबले महंगी होती हैं, लेकिन इनकी टिकाऊपन और कम मेंटेनेंस के कारण कॉन्ट्रैक्टर्स इन्हें ही प्राथमिकता देते हैं। उदाहरण के लिए, चेन्नई मेट्रो विस्तार प्रोजेक्ट में 10 Herrenknecht मशीनें इस्तेमाल की जा रही हैं।
BEML पर सरकार का फोकस
सरकार विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सरकारी कंपनी BEML के जरिए स्वदेशी समाधान तैयार करने पर जोर दे रही है। 2025 से 2035 के बीच भारत को 340 TBM मशीनों की जरूरत होगी। एक मशीन की कीमत ₹80 करोड़ से लेकर ₹800 करोड़ तक होती है, जिससे भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। BEML अब 6 से 16.5 मीटर व्यास वाली मशीनों के स्वदेशी डिजाइन पर काम कर रही है।
निवेशकों के लिए संकेत
हाई-एंड टनलिंग मशीनरी बनाना एक जटिल काम है। कोलकाता मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट्स में पहले भी स्थानीय स्तर पर असेंबल की गई मशीनों का इस्तेमाल हो चुका है, लेकिन पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने के लिए बड़े निवेश की जरूरत है। निवेशकों को BEML की मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटी में होने वाली प्रगति पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इससे भविष्य में प्रोजेक्ट्स की लागत कम हो सकती है।
