Sustainable Packaging: भारत का पैकेजिंग सेक्टर अब कमर्शियल दौर में, स्टार्टअप्स की बढ़ी मांग

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Sustainable Packaging: भारत का पैकेजिंग सेक्टर अब कमर्शियल दौर में, स्टार्टअप्स की बढ़ी मांग

भारत का सस्टेनेबल पैकेजिंग सेक्टर अब प्रयोगों के दौर से निकलकर कमर्शियल B2B कॉन्ट्रैक्ट्स पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। सख्त सरकारी नियमों के बीच PeelON और Lucro जैसी कंपनियां अब बड़े FMCG क्लाइंट्स को सर्व कर रही हैं, हालांकि पारंपरिक प्लास्टिक के मुकाबले कीमत का अंतर अभी भी एक चुनौती है।

भारत का पैकेजिंग इकोसिस्टम एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। अब फोकस पायलट प्रोजेक्ट्स से हटकर लॉन्ग-टर्म कमर्शियल वायबिलिटी और यूनिट इकोनॉमिक्स पर शिफ्ट हो गया है। इस बदलाव की मुख्य वजह सरकारी मैंडेट्स और बड़ी FMCG कंपनियों की बढ़ती जरूरतें हैं।

मार्केट में नए खिलाड़ी

Lucro जैसी कंपनियां अब रिसाइकिल वेस्ट का इस्तेमाल करके बड़े ब्रांड्स के लिए प्राइमरी पैकेजिंग सॉल्यूशन बना रही हैं। वहीं, बायो-टेक स्टार्टअप PeelON, जिसने $1 मिलियन की सीड फंडिंग जुटाई है, अब डेयरी और फ्रेश प्रोड्यूस सेक्टर के लिए मटेरियल रिप्लेसमेंट पर काम कर रहा है।

कीमत की चुनौती

इस सेक्टर के सामने सबसे बड़ा रोड़ा पारंपरिक प्लास्टिक की कम कीमत है। बायोडिग्रेडेबल रेजिन की लागत पारंपरिक प्लास्टिक से 85% से 130% तक ज्यादा होती है, जिससे कंपनियों के लिए लागत को मैनेज करना मुश्किल हो जाता है। इसे देखते हुए Boston Polymers जैसी कंपनियां अब 'हाई-परफॉर्मेंस फिल्म्स' पर काम कर रही हैं, जो प्रोडक्ट की शेल्फ लाइफ बढ़ाकर इस लागत को उचित ठहराती हैं।

रेगुलेटरी सपोर्ट

भारत में 'Extended Producer Responsibility' (EPR) के सख्त नियमों ने गेम बदल दिया है। रिसाइकिल कंटेंट के टारगेट को 30% से बढ़ाकर 60% तक करने के लक्ष्य ने बड़ी कंपनियों को मजबूर कर दिया है कि वे अब केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि जरूरत के लिए सस्टेनेबल पार्टनर्स की तलाश करें।

आने वाले समय में वही कंपनियां सफल होंगी जो अपनी प्रोडक्शन कॉस्ट को स्केल के जरिए कम कर पाएंगी और बड़े ब्रांड्स के साथ लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल कर सकेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.