स्पेशियलिटी स्टील पर भारत का बड़ा दांव, ₹13,203 Cr निवेश पर सरकार का भरोसा, पर यूरोप का 'CBAM' बना बड़ी चुनौती!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
स्पेशियलिटी स्टील पर भारत का बड़ा दांव, ₹13,203 Cr निवेश पर सरकार का भरोसा, पर यूरोप का 'CBAM' बना बड़ी चुनौती!
Overview

भारत सरकार स्पेशियलिटी स्टील सेक्टर में क्रांति लाने की तैयारी में है! 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) स्कीम 1.2 के तहत, कंपनियों ने **₹13,203 करोड़** के निवेश का कमिटमेंट किया है। इस पहल से FY2031 तक **8.7 मिलियन-टन** अतिरिक्त कैपेसिटी जुड़ने की उम्मीद है, जो ऑटो, डिफेंस जैसे अहम सेक्टर्स के लिए जरूरी हाई-एंड स्टील ग्रेड्स का उत्पादन बढ़ाएगा। हालांकि, इस बड़ी उड़ान से पहले सेक्टर को यूरोपियन यूनियन (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक बाधाओं से निपटना होगा, जो एक्सपोर्ट्स और प्रॉफिट पर असर डाल सकते हैं।

PLI 1.2: स्पेशियलिटी स्टील की कैपेसिटी बढ़ाने का सरकारी प्लान

केंद्र सरकार ने स्पेशियलिटी स्टील को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम का तीसरा चरण, जिसे PLI 1.2 नाम दिया गया है, लॉन्च किया है। इस स्कीम के तहत, 55 कंपनियों ने 85 एग्रीमेंट्स के जरिए ₹13,203 करोड़ के शुरुआती निवेश का वादा किया है [2, 3, 4]। इस कदम का मकसद इलेक्ट्रिकल स्टील, अलॉय और स्टेनलेस स्टील, और कोटेड प्रोडक्ट्स जैसे क्रिटिकल हाई-एंड स्टील सेगमेंट में डोमेस्टिक प्रोडक्शन को मजबूत करना है। ये ग्रेड्स ऑटोमोटिव, रेलवे, डिफेंस और एयरोस्पेस जैसे प्रमुख उद्योगों के लिए बेहद जरूरी हैं [2]। स्कीम, 4% से 15% तक के इंसेंटिव रेट्स 5 साल की अवधि के लिए ऑफर कर रही है, जिसका लक्ष्य निवेश, तकनीकी उन्नयन और वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देना है। इंसेंटिव का वितरण FY2026-27 से शुरू होने की उम्मीद है [2, 4]। इस पहल से वित्त वर्ष 2031 तक 8.7 मिलियन-टन स्पेशियलिटी स्टील कैपेसिटी जुड़ने का अनुमान है [2]।

यह नया चरण PLI स्कीम के पिछले चरणों की बड़ी सफलताओं पर आधारित है, जिन्होंने पहले ही ₹43,874 करोड़ से अधिक के निवेश के वादे हासिल किए हैं और 30,000 से अधिक डायरेक्ट जॉब्स पैदा करने की उम्मीद है, साथ ही 14.3 मिलियन-टन की कैपेसिटी में बड़ी बढ़ोतरी हो रही है [2, 5]। भारत की कुल स्थापित स्टील कैपेसिटी 218 मिलियन-टन प्रति वर्ष है, और लक्ष्य 2031 तक 300 मिलियन-टन और संभावित रूप से 2035-36 तक 400 मिलियन-टन तक पहुंचने का है [6, 10]। घरेलू स्टील मार्केट खुद बहुत मजबूत है, जिसमें FY2026 तक सालाना लगभग 8-9% की ग्रोथ का अनुमान है, जिससे भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक बन गया है [11, 12, 13, 16]।

ग्लोबल ट्रेड की चुनौतियां: CBAM का बड़ा सरदर्द

सरकार के डोमेस्टिक स्टील कैपेबिलिटीज को मजबूत करने के ठोस प्रयासों के बावजूद, यह सेक्टर महत्वपूर्ण बाहरी दबावों का सामना कर रहा है। इसमें सबसे प्रमुख है यूरोपियन यूनियन (EU) का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) [2]। यह पॉलिसी इम्पोर्ट्स पर कार्बन लागत लगाती है, जिसका सीधा असर स्टील जैसे एमिशन-इंटेंसिव गुड्स पर पड़ता है। भारत के लिए, जहां आयरन और स्टील इंडस्ट्री EU को होने वाले CBAM-एक्सपोज्ड एक्सपोर्ट्स का 90% हिस्सा है, यह एक बड़ी बाधा पेश करता है [14]। स्टील सेक्रेटरी संदीप पौडरिक ने CBAM को एक चुनौती स्वीकार किया और भारतीय एक्सपोर्टर्स का समर्थन करने की सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई [2]। हालिया इंडिया-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) में, कई गुड्स पर टैरिफ कम करने के बावजूद, CBAM मैकेनिज्म को बरकरार रखा गया, जिससे स्टील एक्सपोर्टर्स को कोई राहत नहीं मिली [14, 21, 28]। इस स्थिति ने भारतीय स्टील मिल्स को, जो अपने एक्सपोर्ट्स का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यूरोप भेजते हैं, अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे वैकल्पिक बाजारों की ओर रुख करने पर मजबूर कर दिया है [21, 24]। EU के सख्त पर्यावरणीय मानक ग्लोबल सप्लाई चेन्स को नया आकार दे रहे हैं, डीकार्बोनाइजेशन को बढ़ावा दे रहे हैं और संभावित रूप से ट्रेड फ्लो को 'ग्रीन स्टील' हब्स की ओर पुनर्स्थापित कर रहे हैं [15]।

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