सप्लाई की कमी और लागत का बढ़ा बोझ
Approved List of Models and Manufacturers (ALMM) List-II मैंडेट के लागू होने से भारत के सोलर सेक्टर की इकोनॉमी पूरी तरह बदल गई है। नए नियमों के तहत, सरकारी योजनाओं, नेट-मीटर्ड और ओपन-एक्सेस सोलर प्रोजेक्ट्स में सिर्फ घरेलू स्तर पर बने सोलर सेल का ही इस्तेमाल करना होगा। यह कदम सस्ते इंपोर्ट पर एक रेगुलेटरी बैरियर की तरह है। लेकिन, एक बड़ी समस्या सामने आ रही है: जहां देश की सोलर मॉड्यूल बनाने की क्षमता 190 GW से ज्यादा हो चुकी है, वहीं घरेलू सोलर सेल का प्रोडक्शन अभी भी सिर्फ 30-40 GW के आसपास ही है। इससे एक भारी सप्लाई गैप पैदा हो गया है, जो प्रोजेक्ट्स को रोक सकता है और कई मध्यम आकार की कंपनियों की फिजिबिलिटी पर खतरा पैदा कर सकता है।
'आत्मनिर्भरता' की कीमत
डेवलपर्स और EPC कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए यह सिर्फ एक एडमिनिस्ट्रेटिव बदलाव नहीं, बल्कि सीधे उनके मुनाफे पर चोट है। इंडस्ट्री का अनुमान है कि सस्ते इंपोर्टेड सेल (जो अक्सर बड़े पैमाने पर उत्पादन वाले देशों से आते हैं) का इस्तेमाल बंद होने से मॉड्यूल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। घरेलू, ALMM-कंप्लायंट मॉड्यूल की कीमतें ₹21–22 प्रति वाट से बढ़कर ₹25–27 प्रति वाट तक पहुंच गई हैं। इस बढ़ोतरी से फिक्स्ड-टैरिफ पावर परचेज एग्रीमेंट के तहत चल रहे बड़े प्रोजेक्ट्स का रिटर्न कम हो सकता है। इससे डेवलपर्स को 'आत्मनिर्भर भारत' के रणनीतिक लक्ष्य और कम होते IRR के बीच संतुलन बनाना होगा।
वर्टिकल इंटीग्रेशन का बढ़ता दबदबा
इस पॉलिसी का नतीजा मार्केट कंसॉलिडेशन के रूप में सामने आ रहा है। जो मॉड्यूल निर्माता खुद के सेल प्रोडक्शन पर निर्भर नहीं हैं, वे दोहरी मार झेल रहे हैं: उन्हें सेल खरीदने के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं और साथ ही वे उन बड़ी, वर्टिकली इंटीग्रेटेड कंपनियों से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं, जो सेल और मॉड्यूल दोनों बनाती हैं। मौजूदा ALMM सर्टिफिकेशन्स के विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियां ही अप्रूव्ड सेल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी का बड़ा हिस्सा कंट्रोल करती हैं। छोटी कंपनियां, जिनके पास सेल लाइन के लिए ₹250-400 करोड़ प्रति GW का निवेश करने के लिए कैपिटल नहीं है, वे धीरे-धीरे मार्जिनलाइज्ड हो रही हैं। आने वाले फाइनेंशियल क्वार्टर्स में इंडस्ट्री में बड़े मर्जर और एक्वीजीशन देखने को मिल सकते हैं।
फोरेंसिक रिस्क फैक्टर
सबसे बड़ा खतरा प्रोजेक्ट में देरी और रेगुलेटरी अड़चनों का है। हालांकि मिनिस्ट्री ने प्रोजेक्ट्स को पूरी तरह रुकने से बचाने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी (NISE) के जरिए एक सीमित, केस-बाय-केस अपील प्रोसेस शुरू की है, लेकिन इसमें सफलता के लिए निवेश और प्रगति के पुख्ता सबूत पेश करने होंगे। मैन्युफैक्चरर्स के लिए यह ट्रांजिशन पीरियड काफी जोखिम भरा है। अगर वे घरेलू सेल की भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर सप्लाई हासिल करने में फेल रहे, तो उनके निवेश अटक सकते हैं, सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स पर भारी जुर्माना लग सकता है और कैपिटल पावर सेक्टर के ज्यादा स्टेबल सेगमेंट्स की ओर जा सकता है। इंडस्ट्री फिलहाल घरेलू सेल कैपेसिटी बढ़ाने की रफ्तार पर निर्भर है। अगर यह रफ्तार महत्वाकांक्षी 500 GW के लक्ष्य के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती है, तो यह पॉलिसी अनजाने में भारत के रिन्यूएबल एनर्जी रोलआउट में बाधा बन सकती है।
