ऊंची कैपिटल कॉस्ट (Capital Cost) शिपयार्ड्स की ग्रोथ में डाल रही रोड़ा
भारत के घरेलू समुद्री क्षेत्र को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें सरकारी सब्सिडी पूरी तरह से शायद ठीक न कर पाए। शिपबिल्डिंग स्कीमों के लिए ₹44,000 करोड़ से ज्यादा का फंड होने के बावजूद, भारतीय शिपयार्ड्स को 9% से 10% तक का लोन मिल रहा है। यह दरें प्रमुख पूर्वी एशियाई देशों के मुकाबले 3% से 5% ज्यादा हैं। जहां 15% से 25% की सीधी सब्सिडी ऑपरेशनल कॉस्ट के अंतर को कम करने में मदद करती है, वहीं खास मरीन फाइनेंसिंग संस्थानों की कमी एक बड़ी बाधा है। 2047 तक सालाना शिपबिल्डिंग क्षमता को 0.072 मिलियन ग्रॉस टन (GT) से बढ़ाकर 11 मिलियन GT से ज्यादा करने का लक्ष्य, किफायती और लंबी अवधि के कैपिटल के बिना मुश्किल लगता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और एफिशिएंसी (Efficiency) की दिक्कतें
फाइनेंसिंग के अलावा, यह इंडस्ट्री सीमित क्षमता से भी जूझ रही है। तमिलनाडु ग्रीनफील्ड क्लस्टर (Tamil Nadu greenfield cluster) जैसे नए प्रोजेक्ट्स और Titagarh Naval Systems में विस्तार के बावजूद, प्रोडक्शन कॉस्ट ग्लोबल बेंचमार्क से 15% से 20% ज्यादा बनी हुई है। डोमेस्टिक ऑपरेटर्स को लॉजिस्टिक्स (Logistics) की भी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं, जैसे वर्कशॉप्स के लिए बिजली की अनिश्चित सप्लाई और नदियों का वह आकार जो बड़े जहाजों के लिए ठीक नहीं है। भारत का 85% से ज्यादा क्रूड ऑयल ट्रांसपोर्ट विदेशी जहाजों पर निर्भर है, जो एक स्ट्रेटेजिक रिस्क (Strategic Risk) है। Bharat Container Shipping Line जैसी पहलों के लिए सिर्फ जहाज बनाना ही काफी नहीं होगा; ऑटोमेशन (Automation) और मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन (Modular Construction) को शामिल करते हुए समुद्री सप्लाई चेन में पूरी तरह से बदलाव की जरूरत होगी।
निवेशकों को सावधान रहने की सलाह
निवेशकों को ऑर्डर एग्जीक्यूशन (Order Execution) की रफ्तार और प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) पर पड़ने वाले असर को लेकर सतर्क रहना चाहिए। Shipping Corporation of India जैसी कंपनियां, जो राष्ट्रीय शिपबिल्डिंग प्रयासों का हिस्सा हैं, सिकुड़ते मार्जिन और अप्रत्याशित कमाई के कारण अपने फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर दबाव का अनुभव कर रही हैं। Container Corporation of India समेत लॉजिस्टिक्स सेक्टर में भी कमाई से तेज़ी से बढ़ते खर्चों के कारण प्रॉफिट कमजोर हुए हैं। छोटे शिपयार्ड्स के लिए बैंक गारंटी (Bank Guarantee) हासिल करना और जटिल रेगुलेशंस (Regulations) को पार करना अभी भी बड़ी बाधाएं हैं। पिछली सपोर्ट पॉलिसीज़ का असर सीमित रहा है, और केवल कुछ ही रजिस्टर्ड शिपयार्ड्स को वास्तव में लाभ मिला है, जो कि हाई एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) को दर्शाता है।
भविष्य की राह टेक्नोलॉजी और स्किल्स (Skills) पर निर्भर
सरकार के Maritime Amrit Kaal Vision 2047 का लक्ष्य भारत को टॉप 5 ग्लोबल शिपबिल्डिंग देशों में शामिल करना है। हालांकि, इसे हासिल करना मिले हुए आवेदनों की संख्या से ज्यादा टेक्नोलॉजी (Technology) में प्रगति और वर्कफोर्स ट्रेनिंग (Workforce Training) पर निर्भर करेगा। Maritime Development Fund का सफल कार्यान्वयन और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (Public-Private Partnerships) की टेक्नोलॉजी गैप (Technology Gap) को पाटने की क्षमता अहम होगी। बड़े जहाजों के निर्माण में प्रगति, न कि सिर्फ कोस्टल फेरी (Coastal Ferry), यह तय करेगी कि क्या भारत का समुद्री क्षेत्र वास्तव में हाई-वैल्यू ग्लोबल ट्रेड मार्केट में जगह बना पाएगा।
