भारत का ग्रीन एनर्जी फ्यूचर: 'मेक इन इंडिया' से इंपोर्ट पर वार, मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की तैयारी

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत का ग्रीन एनर्जी फ्यूचर: 'मेक इन इंडिया' से इंपोर्ट पर वार, मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की तैयारी
Overview

भारत अपने एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) को मजबूत करने के लिए एक बड़े कदम की ओर बढ़ रहा है। अब क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के इंपोर्ट (Import) पर निर्भर रहने के बजाय, देश में मजबूत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) पर ज़ोर दिया जाएगा। INOXGFL ग्रुप के देवांश जैन का कहना है कि इस बदलाव के लिए भारी विदेशी निवेश, तेज प्रोजेक्ट डिलीवरी और स्थिर नीतियों की ज़रूरत है, ताकि भारत वैश्विक क्लीन एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग हब बन सके।

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डोमेस्टिक एनर्जी प्रोडक्शन को मिलेगी रफ्तार

रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) के क्षेत्र में भारत की बड़ी योजनाओं के लिए यह ज़रूरी है कि क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के इंपोर्ट (Import) पर निर्भरता कम करके घरेलू मैन्युफैक्चरिंग (Domestic Manufacturing) को मज़बूत किया जाए। INOXGFL ग्रुप के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, देवांश जैन ने इस अहम बदलाव को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत का एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) सिर्फ पर्यावरण का लक्ष्य नहीं, बल्कि लंबे समय तक आर्थिक मज़बूती, एनर्जी इंडिपेंडेंस (Energy Independence) और मैन्युफैक्चरिंग लीडरशिप (Manufacturing Leadership) के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह बात ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) में लगातार आ रही रुकावटों को देखते हुए और भी ज़रूरी हो जाती है।

विदेशी निवेश से ग्रोथ को मिलेगी ऊर्जा

भारत की क्षमताओं का विस्तार करने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश (Foreign Investment) की ज़रूरत होगी। पिछले 25 सालों में भारत ने रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में करीब 23 बिलियन डॉलर का निवेश आकर्षित किया है। जैन का मानना है कि भविष्य की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए यह राशि काफी बढ़ानी होगी। यह पूंजी सोलर मॉड्यूल, सेल, विंड टर्बाइन, एनर्जी स्टोरेज सिस्टम, ग्रीन हाइड्रोजन इक्विपमेंट और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स सहित पूरे क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन में घरेलू उत्पादन (Domestic Production) को विकसित करने के लिए ज़रूरी है। भारत की रिन्यूएबल एनर्जी ग्रोथ ने फॉरेन एक्सचेंज (Foreign Exchange) खर्च को नियंत्रित करने में मदद की है, लेकिन सच्ची एनर्जी इंडिपेंडेंस के लिए मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता हासिल करना ज़रूरी है।

व्यवहार्यता साबित करने से तेज़ ग्रोथ की ओर

भारत पहले ही यह साबित कर चुका है कि रिन्यूएबल एनर्जी एक मुख्यधारा और व्यवहार्य (Viable) विकल्प है, जो अब वैकल्पिक स्रोत से आगे बढ़कर ज़रूरी पावर इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) का हिस्सा बन गया है। यह दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट है, जिसे स्थिर नीतियों (Stable Policies) और संस्थागत समर्थन (Institutional Support) हासिल है। हालांकि, ग्रोथ के अगले चरण के लिए तेज़, बड़े पैमाने पर उत्पादन (Large-scale Production) और साथ ही आत्मनिर्भरता विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है। शुरुआती चरण ने व्यवहार्यता (Feasibility) साबित की; अगले चरण में तेज़ी से स्केल (Scale) हासिल करना प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता हासिल करना है, और इस लक्ष्य को 750 GW तक बढ़ाने पर भी चर्चा हो सकती है। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जनरेशन, ट्रांसमिशन, स्टोरेज, फाइनेंसिंग और मैन्युफैक्चरिंग में तेज़ एग्जीक्यूशन (Execution) की ज़रूरत होगी।

निरंतर सफलता के लिए मुख्य स्तंभ

जैन ने सेक्टर की ग्रोथ के लिए तीन मुख्य प्राथमिकताओं की पहचान की है:

  1. तेज़ प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन (Expedited Project Implementation): भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition), ट्रांसमिशन एक्सेस (Transmission Access) और पर्यावरण संबंधी मंज़ूरियों (Environmental Approvals) में बेहतर तालमेल के ज़रिए प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन को तेज़ करना।
  2. ग्रिड मॉडर्नाइजेशन (Grid Modernization): रिन्यूएबल एनर्जी के बढ़ते उपयोग के साथ एडवांस्ड स्टोरेज सिस्टम (Advanced Storage Systems) और बैलेंसिंग मैकेनिज्म (Balancing Mechanisms) से ग्रिड को अपग्रेड करना।
  3. किफायती दाम और पॉलिसी स्टेबिलिटी (Affordability and Policy Stability): डेवलपर्स और मैन्युफैक्चरर्स के लिए लंबे समय तक पॉलिसी में एकरूपता बनाए रखते हुए किफायती ऊर्जा (Affordable Energy) को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। स्थिर नीतियां फाइनेंसिंग की लागत को कम करने और निवेशकों का भरोसा बनाए रखने में मदद करती हैं।

मैन्युफैक्चरिंग पावर बनने की राह के जोखिम

क्लीन एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग लीडर (Manufacturing Leader) बनने की दिशा में भारत की प्रगति में कई जोखिम बाधा डाल सकते हैं। एक बड़ी चिंता वैश्विक लीडर्स, खासकर चीन, की मैन्युफैक्चरिंग स्केल (Manufacturing Scale) और स्पीड से मुकाबला करना है, जो सोलर पीवी (Solar PV) और बैटरी प्रोडक्शन जैसे क्षेत्रों पर हावी है। डोमेस्टिक प्रोडक्शन के लक्ष्य होने के बावजूद, इंपोर्टेड रॉ मटेरियल (Imported Raw Materials) और मुख्य कंपोनेंट्स (Key Components) पर निर्भरता अभी भी सेक्टर को सप्लाई चेन के मुद्दों (Supply Chain Issues) और कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बना सकती है। लगातार नीतियों को लंबे समय तक बनाए रखना महत्वपूर्ण है; किसी भी अस्थिरता की धारणा ज़रूरी विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर सकती है, जिससे लागत बढ़ेगी और निवेशक का भरोसा कम होगा। टेक्नोलॉजी के पुराना (Technological Obsolescence) होने का जोखिम भी रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में निरंतर निवेश की मांग करता है। बड़े पैमाने पर ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) हासिल करना, मंज़ूरियों को सुव्यवस्थित करना और ग्रिड को इंटीग्रेट करना महत्वपूर्ण ऑपरेशनल चुनौतियां पेश करता है। बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग के लिए पर्याप्त तेज़ी से कुशल कार्यबल (Skilled Workforce) तैयार करना एक और महत्वपूर्ण कारक है।

वैश्विक क्लीन एनर्जी हब बनना

भारत के पास सिर्फ एक प्रमुख रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट होने से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी का केंद्र बनने का महत्वपूर्ण अवसर है। आने वाला दशक वैश्विक ऊर्जा के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है, और घरेलू क्षमताओं पर रणनीतिक फोकस तथा पूंजी को आकर्षित करना भारत को इस भविष्य को आकार देने में मदद कर सकता है।

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