Reliance on Imported Parts Hits India's Manufacturing Costs

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Reliance on Imported Parts Hits India's Manufacturing Costs

भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अभी भी चाइना जैसे देशों से इंपोर्ट किए गए पुर्जों पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इससे प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ रही है और प्रोडक्ट की क्वालिटी पर भी असर पड़ रहा है। अब समय आ गया है कि घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत किया जाए, जिसमें राजकोट और लुधियाना जैसे शहरों के छोटे मैन्युफैक्चरर्स अहम भूमिका निभा सकते हैं।

इंपोर्ट पर निर्भरता का असर

भारत का वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का सपना एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है - वह है सप्लाई चेन का कमजोर होना। जहां देश मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक व्हीकल और डिफेंस जैसे फिनिश्ड प्रोडक्ट्स की असेंबली में आगे बढ़ रहा है, वहीं जरूरी छोटे पुर्जे, जैसे इंडस्ट्रियल फास्टनर्स, बेयरिंग्स और कैस्टर व्हील्स, काफी हद तक इंपोर्ट किए जाते हैं। इनमें से ज्यादातर की सप्लाई चाइना से होती है, जो कम दाम और बड़ी मात्रा में माल सप्लाई करने में माहिर है।

छोटे और जरूरी कंपोनेंट्स के लिए बाहरी सप्लायर्स पर निर्भरता भारतीय कंपनियों के लिए बड़ी दिक्कतें पैदा करती है। लॉजिस्टिक्स, करेंसी के उतार-चढ़ाव और क्वालिटी की अनिश्चितता जैसे रिस्क हमेशा बने रहते हैं। कल्पना कीजिए, हेल्थकेयर या लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर में, एक इंपोर्टेड कैस्टर व्हील की खराबी से पूरे उपकरण का परफॉरमेंस बिगड़ सकता है। यह निर्भरता प्रोडक्शन कॉस्ट तय करती है और भारतीय कंपनियों की ग्रोथ को भी सीमित करती है, क्योंकि वे विदेशी सप्लायर्स से सप्लाई रुकने पर फौरन मुश्किल में पड़ जाती हैं।

कैस्टर व्हील्स के मामले में, इंपोर्ट किए गए माल का बड़ा हिस्सा चाइना से आता है। हालांकि देश में इनका प्रोडक्शन होता भी है, पर लोकल प्रोड्यूसर्स बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के दामों और प्रोडक्शन स्केल का मुकाबला नहीं कर पाते। यह समस्या सिर्फ आसान कंपोनेंट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि मशीनरी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए जरूरी खास फास्टनर्स और बेयरिंग्स तक फैली हुई है।

इंडस्ट्री की गहराई बढ़ाना

भारतीय मैन्युफैक्चरिंग को सिर्फ असेंबली से आगे बढ़कर ज्यादा वैल्यू क्रिएट करने के लिए, सब-असेंबली और रॉ मटेरियल के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम बनाना होगा। इसके लिए सिर्फ फैक्ट्री फ्लोर से कहीं ज्यादा निवेश की जरूरत है – इसमें लोकल टूल रूम, एडवांस टेस्टिंग फैसिलिटीज और स्किल्ड टेक्निकल वर्कफोर्स शामिल हैं। इनके बिना, भारत सिर्फ फाइनल असेंबली का डेस्टिनेशन बनकर रह जाएगा, जिससे प्रॉफिट मार्जिन कम रहता है।

माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) इस गैप को भरने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। राजकोट, लुधियाना और कोयंबटूर जैसे इलाकों में मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर पहले से ही मेटल वर्किंग और प्रिसिजन इंजीनियरिंग की क्षमता रखते हैं। अगर ये कंपनियां हाई-क्वालिटी, स्टैंडर्ड कंपोनेंट्स का प्रोडक्शन शुरू कर पाती हैं, तो वे मौजूदा इंपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा बदल सकती हैं।

आगे के लिए जरूरी कदम

भारतीय मैन्युफैक्चरर्स की वैल्यू चेन में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने की क्षमता, क्वालिटी, मटेरियल कंसिस्टेंसी और लागत-प्रतिस्पर्धा के ग्लोबल स्टैंडर्ड्स को पूरा करने पर निर्भर करेगी। इन्वेस्टर्स इस बात पर नजर रख सकते हैं कि आने वाली इंडस्ट्रियल पॉलिसी या प्राइवेट सेक्टर का कैपिटल खर्च लोकल सप्लायर बेस को मजबूत करने पर केंद्रित है या नहीं। अगला अहम कदम असेंबली से हटकर जरूरी सब-कंपोनेंट्स के डोमेस्टिक प्रोडक्शन की ओर बढ़ना होगा, जो प्रॉफिट मार्जिन बढ़ाने और ग्लोबल सप्लाई चेन के दबाव को कम करने के लिए जरूरी है।

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