NIP की शुरुआत 2019 में हुई थी और तब से यह काफी बड़ा हो गया है। March 2026 तक, पाइपलाइन में करीब 14,563 प्रोजेक्ट्स शामिल हैं, जो शुरुआती संख्या से दोगुने से भी ज्यादा हैं। अनुमानित निवेश (projected investment) में लगभग 92% की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जो ₹111 ट्रिलियन से बढ़कर लगभग ₹213 ट्रिलियन हो गया है। यह बदलाव भारत की अर्थव्यवस्था को ग्लोबल चुनौतियों के मुकाबले और मजबूत करने के लिए बड़े, पूंजी-गहन प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ता कदम है।
NIP अब 33 अलग-अलग सेक्टर और 79 सब-सेक्टर को कवर कर रहा है, जिससे निवेशकों को स्पष्टता मिल रही है। हालांकि, निवेश में भारी कंसंट्रेशन (concentration) देखने को मिल रहा है। लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर (Logistics infrastructure) अकेले कुल पाइपलाइन वैल्यू का लगभग 40% है, जबकि सड़कें और हाईवे (Roads and Highways) पूरे NIP आउटले (outlay) का करीब 25% हिस्सा बना रहे हैं। इसका मुख्य मकसद कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना और लॉजिस्टिक्स की लागत को कम करना है।
जहां लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश सबसे आगे है, वहीं फाइनेंशियल ईयर 2026 में सड़कें और हाईवे के लिए नए अवार्ड्स (awards) में भारी गिरावट आई है, जो एक तरह की मंदी का संकेत दे रहा है। इसके विपरीत, रेलवे (Railways) और शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट (urban public transport) में निवेश स्थिर बना रहा, जो मास ट्रांजिट (mass transit) में निरंतर पूंजी निवेश को दर्शाता है। एनर्जी और पावर (Energy and power) में निवेश कुल NIP खर्च का 18% पर स्थिर रहा, जिसमें तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर फिर से जोर दिया गया है। एनर्जी स्टोरेज (Energy storage) और कोयला (Coal) जैसे सेक्टर्स ने भी इस दौरान महत्वपूर्ण ग्रोथ दर्ज की है।
कंस्ट्रक्शन (Construction) और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश में भी फाइनेंशियल ईयर 2026 में तेज गिरावट आई है। इसकी बड़ी वजह रियल एस्टेट (real estate) आवंटन में साल-दर-साल लगभग 47% की भारी कमी है। इस संकुचन (contraction) ने NIP की समग्र ग्रोथ को काफी प्रभावित किया है। भौगोलिक स्तर पर भी NIP निवेश राज्यों में असमान है; पश्चिमी राज्य निवेश में अगुवाई कर रहे हैं, लेकिन उत्तरी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में इलाके और आकार की चुनौतियों के कारण यह पिछड़ रहे हैं।
NIP के इस बदलते परिदृश्य से यह स्पष्ट है कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की राह में अब प्रोजेक्ट्स की पहचान करने की बजाय, उनके एग्जीक्यूशन (execution) की क्षमता एक बड़ी बाधा बन गई है। नए प्रोजेक्ट्स में अक्सर मौजूदा प्रोजेक्ट्स का ही विस्तार होता है, इसलिए समय पर एग्जीक्यूशन, पर्याप्त फाइनेंसिंग (financing) जुटाना और सभी संबंधित हितधारकों (stakeholders) के बीच मजबूत समन्वय (coordination) ही इंफ्रास्ट्रक्चर डिलीवरी को सफल बना सकता है।
