एम्बिशन (Ambition) और टारगेट (Target) क्या है?
भारत का सपना है कि FY31 तक वह दुनिया भर के मोबाइल प्रोडक्शन का 30-35% हिस्सा अपने नाम करे। इसके लिए $110-130 बिलियन के प्रोडक्शन और $55-70 बिलियन के एक्सपोर्ट का टारगेट है। अभी भारत का शेयर लगभग 15% है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए नई प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव (PLI) 2.0 स्कीम का सहारा लिया जा रहा है, जो इंडस्ट्री के लिए ग्रोथ और लोकल सप्लाई चेन बनाने में अहम मानी जा रही है।
ग्लोबल मार्केट की सुस्ती और एक्सपोर्ट पर निर्भरता
यह एम्बिशन (Ambition) ऐसे समय में है जब ग्लोबल स्मार्टफोन शिपमेंट्स में भारी गिरावट का अनुमान है। 2026 तक ग्लोबल शिपमेंट्स में 12.9% की कमी आ सकती है। हालांकि, हाल ही में भारत के स्मार्टफोन एक्सपोर्ट में ज़बरदस्त उछाल आया है, जो FY24 से FY25 में 47.4% बढ़कर $30.13 बिलियन हो गया। इसमें बड़ा हिस्सा अमेरिका का है। यह अमेरिका का फेवर (Favor) शायद चीन के साथ ट्रेड टेंशन (Trade Tension) के चलते मिला है, लेकिन ट्रेड पॉलिसीज़ (Trade Policies) में बदलाव या अनिश्चितता भारत के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकती है।
कॉम्पिटिशन (Competition) में कौन आगे?
भारत को सीधे तौर पर मैन्युफैक्चरिंग के दिग्गजों जैसे चीन और वियतनाम से मुकाबला करना है। चीन के पास एक मजबूत सप्लाई चेन है, जबकि वियतनाम, सैमसंग (Samsung) की बदौलत 2024 में $53.9 बिलियन से ज़्यादा के फोन और कंपोनेंट्स एक्सपोर्ट कर चुका है। हाल ही में भारत अमेरिका को सबसे ज़्यादा स्मार्टफोन सप्लाई करने वाला देश बना है (Q2 2025 में 44% इम्पोर्ट भारत से, चीन से 25%)। यह बड़ी हद तक Apple जैसी कंपनियों के चीन से बाहर निकलने की स्ट्रैटेजी (Strategy) का नतीजा है। Apple 2026 तक भारत में अपने ज़्यादातर US-बाउंड iPhones को असेंबल (Assemble) करने की प्लानिंग कर रही है, जिसके लिए Foxconn $1.5 बिलियन से ज़्यादा का इनवेस्टमेंट कर रहा है।
कॉस्ट डिसएडवांटेज (Cost Disadvantage) और सरकारी स्कीम्स
भारत का टारगेट लोकल कंपोनेंट्स पर लगभग 5% का इन्सेंटिव देकर चीन के मुकाबले 10-12% के कॉस्ट डिसएडवांटेज (Cost Disadvantage) को कम करना है। मार्च 2025 में नॉन-सेमीकंडक्टर कंपोनेंट्स के लिए ₹59,000 करोड़ के इनवेस्टमेंट वाला एक अलग स्कीम भी अप्रूव हुई है। पिछले एक दशक में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में छह गुना का उछाल आया है, जो FY2025 में $129.9 बिलियन तक पहुंच गया, और मोबाइल यूनिट्स 2 से बढ़कर 300 हो गई हैं। हालांकि, 2026 तक ग्लोबल मेमोरी चिप्स की किल्लत की उम्मीद है, जो लेट 2027 तक बनी रह सकती है। यह लागत बढ़ाएगी और Apple व Samsung जैसी बड़ी कंपनियों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
मुख्य रिस्क (Risks) और घरेलू बाज़ार की स्थिति
भारत के मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ के रास्ते में कई बड़े रिस्क (Risk) हैं। एक्सपोर्ट पर ज़्यादा निर्भरता, खासकर अमेरिका पर, सेक्टर को ट्रेड पॉलिसीज़ और भू-राजनीतिक तनावों के प्रति संवेदनशील बनाती है। चीन की डेवलप्ड सप्लाई चेन और वियतनाम के मैन्युफैक्चरिंग बेस से तगड़ा कॉम्पिटिशन है। मेमोरी चिप्स की कमी जो 2027 के अंत तक चल सकती है, कंपोनेंट कॉस्ट बढ़ाएगी और डिमांड कम कर सकती है। PLI 2.0 की सफलता सरकार के सपोर्ट और ग्लोबल ट्रेड रूल्स के साथ तालमेल पर निर्भर करेगी। साथ ही, एक्सपोर्ट पर फोकस घरेलू बाजार की अनदेखी कर सकता है, जिसके इस साल कीमत बढ़ने की वजह से कॉन्ट्रैक्ट (Contract) होने का अनुमान है।
आगे की राह और मार्केट का अनुमान
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) मार्केट 2026 से 2032 के बीच 17.5% के CAGR से बढ़कर 2032 तक $197.8 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। एनालिस्ट्स (Analysts) को उम्मीद है कि भारत 2025 में ग्लोबल स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट का 20% हिस्सा हासिल कर लेगा, भले ही ग्लोबल मंदी हो, जिसमें Apple और Samsung अहम भूमिका निभाएंगे। सरकार नए एक्सपोर्ट-फोकस्ड इन्सेंटिव्स और लोकल सोर्सिंग सपोर्ट पर विचार कर रही है। हालांकि, इन पॉलिसियों को सप्लाई चेन के मुद्दे, बढ़ती लागत और बदलते ट्रेड नियम जैसे टेस्ट से गुजरना होगा, जो अनुमानित ग्रोथ को धीमा कर सकते हैं।