देश की समुद्री ताकत बढ़ाने की कवायद: ₹77,000 करोड़ का बड़ा दांव
भारत सरकार देश के समुद्री व्यापार को मजबूत करने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है। इस योजना के तहत घरेलू शिपिंग और शिपबिल्डिंग (जहाज निर्माण) क्षमताओं को बढ़ाने पर ₹77,000 करोड़ खर्च किए जाएंगे। इसका मुख्य उद्देश्य देश की उस बड़ी कमजोरी को दूर करना है जहाँ अपने आयात और निर्यात के लिए 90% से ज़्यादा विदेशी जहाजों पर निर्भर रहना पड़ता है। इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल टू द प्राइम मिनिस्टर के सदस्य संजीव सान्याल ने इस निर्भरता को एक गंभीर रणनीतिक खतरा बताया है। इस पहल में शिपबिल्डिंग, पोर्ट डेवलपमेंट (बंदरगाह विकास) और शिप फ्लैगिंग (जहाजों का पंजीकरण) जैसे मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इस प्रोग्राम से एक आत्मनिर्भर औद्योगिक ढांचा तैयार करने, बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है। पश्चिम बंगाल को इसकी एक प्रमुख लाभार्थी के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि वहां पहले से ही बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और ऐतिहासिक व्यापारिक संबंध मौजूद हैं। इस भारी-भरकम निवेश का लक्ष्य एक राष्ट्रीय बेड़ा (national fleet) तैयार करना है, जो अच्छे और मुश्किल, दोनों समय में अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
₹77,000 करोड़ की योजना: राष्ट्रीय लक्ष्यों और वैश्विक हकीकत का तालमेल
इस पूरी पहल के केंद्र में ₹77,000 करोड़ का एक बड़ा फंड है। इस पैसे का इस्तेमाल राष्ट्रीय बेड़ा बनाने, भारत की समुद्री शक्ति को बढ़ाने और श्रम-गहन शिपबिल्डिंग के ज़रिए 'नौकरियों का एक इकोसिस्टम' बनाने के लिए किया जाएगा। सरकार ने पहले ही कानूनी बदलाव किए हैं, जैसे कि जहाजों को इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देना और मालिकाना हक से जुड़े कानूनों को अपडेट करना, ताकि निवेश को आकर्षित किया जा सके। इसका लक्ष्य समुद्री स्वतंत्रता हासिल करना है, जो लंबी अवधि की व्यापार रणनीति के लिए ज़रूरी है, खासकर तब जब भारत अमेरिका जैसे देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त व्यापार समझौता) कर रहा है। यह 'मेक इन इंडिया' पहल के व्यापक लक्ष्य के साथ भी जुड़ा है, जिसका मकसद भारत को एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब (विनिर्माण केंद्र) बनाना है।
वैश्विक परिदृश्य और प्रतिस्पर्धी माहौल
जहां भारत अपने समुद्री व्यापार पर ज़्यादा नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहा है, वहीं वैश्विक शिपिंग और शिपबिल्डिंग सेक्टर काफी जटिल हैं और स्थापित खिलाड़ियों का दबदबा है। ग्लोबल शिपबिल्डिंग में चीन का दबदबा है, जिसका मार्केट शेयर करीब 59% है, जबकि दक्षिण कोरिया 24% के साथ दूसरे स्थान पर है। बड़े शिपबिल्डिंग समूह जैसे Hyundai Heavy Industries, Samsung Heavy Industries और China State Shipbuilding Corporation इस इंडस्ट्री के अगुआ हैं। इन कंपनियों को उनके बड़े पैमाने, तकनीकी प्रगति और स्थापित सप्लाई चेन का फायदा मिलता है। उदाहरण के लिए, चीनी शिपयार्ड लगभग 60 मिलियन डॉलर में एक कंटेनर जहाज बना सकते हैं, जबकि अमेरिका में इसी तरह के जहाज की लागत अनुमानित 330 मिलियन डॉलर आती है। यह लागत का बड़ा अंतर स्टील की कम कीमतों, कुशल श्रमिकों और मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर का नतीजा है। अनुमान है कि वैश्विक समुद्री व्यापार में मामूली वृद्धि होगी, UNCTAD ने 2025 में केवल 0.5% विस्तार का अनुमान लगाया है, जो वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों को दर्शाता है। भारत का वर्तमान मर्चेंट बेड़ा, हालांकि बढ़ रहा है, लगभग 11,083 जहाजों का है, जो इंडोनेशिया के 11,422 जहाजों या टन भार के हिसाब से स्थापित वैश्विक खिलाड़ियों से काफी कम है।
संरचनात्मक कमजोरियां और निष्पादन (Execution) की चुनौतियाँ
सरकारी आवंटन के बावजूद, भारत के शिपबिल्डिंग सेक्टर को महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। पूंजी की उच्च लागत और ब्याज दरें, जो भारत में अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में 10-10.5% अधिक हैं, एक बड़ी रुकावट हैं। इसके अलावा, भारत की शिपबिल्डिंग क्षमता वर्तमान में वैश्विक स्तर पर लगभग 16वें स्थान पर है, जिसका मार्केट शेयर 1% से भी कम है। यह उद्योग समुद्री-ग्रेड स्टील, प्रोपेलर और कंट्रोल सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण घटकों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, जिससे लागत बढ़ जाती है और देरी की संभावना रहती है। जहाजों की लागत का 20-30% हिस्सा बनाने वाला स्टील, वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव के अधीन है। हालांकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रूड स्टील उत्पादक है, विशेष शिपबिल्डिंग ग्रेड के लिए घरेलू उपलब्धता और लागत-प्रतिस्पर्धा चिंता का विषय बनी हुई है। इस क्षेत्र में तकनीकी खामियां, पुरानी उत्पादन विधियां और सहायक उद्योगों की कमी भी है, जो इसे स्थापित एशियाई शिपबिल्डरों के साथ प्रतिस्पर्धा करने से रोकती है। ₹77,000 करोड़ के इस प्रयास की सफलता इन गहरी संरचनात्मक समस्याओं को दूर करने, पूंजी के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने और केवल बेड़े की संख्या बढ़ाने के बजाय एक वास्तविक प्रतिस्पर्धी घरेलू इकोसिस्टम को बढ़ावा देने पर निर्भर करती है।