DPIIT और NCAER के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत की लॉजिस्टिक्स लागत **₹24.01 लाख करोड़** यानी GDP का करीब **8%** है। सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारों के बीच निवेशक अब मैन्युफैक्चरिंग और कमोडिटी कंपनियों के मार्जिन में सुधार की उम्मीद कर रहे हैं।
भारत में सामान की ढुलाई अब निवेशकों के लिए बड़ा फोकस एरिया बन गई है। DPIIT और NCAER के हालिया असेसमेंट के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में देश की कुल लॉजिस्टिक्स कॉस्ट ₹24.01 लाख करोड़ रही, जो कि देश की GDP का करीब 8% है। मैन्युफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर और माइनिंग जैसे सेक्टरों के लिए यह आंकड़ा बेहद अहम है, क्योंकि उनके कुल खर्चों का बड़ा हिस्सा ट्रांसपोर्टेशन में जाता है। ऐसे में लॉजिस्टिक्स कॉस्ट में मामूली कमी भी इन कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन को सीधे तौर पर बूस्ट कर सकती है।
सरकार 'PM Gati Shakti' और 'National Logistics Policy' जैसी योजनाओं के जरिए इस लागत को कम करने की कोशिश कर रही है। इन पहलों का लक्ष्य सड़क, रेल और बंदरगाहों के बीच तालमेल बिठाना है ताकि सामान की ढुलाई में लगने वाला समय और खर्च कम हो सके। इससे कंपनियों को अपना इन्वेंट्री कॉस्ट घटाने और तेजी से कस्टमर्स तक पहुंचने में मदद मिलेगी।
इन्वेस्टर के नजरिए से देखें, तो सेक्टर अब टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रहा है। दिल्लीवरी (Delhivery) जैसी कंपनियां AI के जरिए रियल-टाइम ट्रैकिंग पर जोर दे रही हैं, जबकि Container Corporation of India (Concor) और Adani Ports जैसे बड़े नाम मल्टीमॉडल इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस कर रहे हैं।
हालांकि, निवेशकों को कुछ रिस्क भी ध्यान में रखने चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी और बढ़ती लागत एक बड़ी चुनौती है। साथ ही, भारतीय लॉजिस्टिक्स सेक्टर अभी भी सड़क परिवहन पर काफी निर्भर है, जिससे डीजल की कीमतों में बदलाव का सीधा असर मार्जिन पर पड़ता है। बाजार का बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित (unorganized) है, जिससे बदलाव की गति धीमी रह सकती है। आने वाले समय में कंपनियों के तिमाही नतीजों पर नजर रखना जरूरी होगा कि क्या ये सुधार वास्तव में उनके मुनाफे में दिख रहे हैं या नहीं।
