यह सिर्फ़ कुछ चुनिंदा प्रोजेक्ट्स की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन (Project Execution) क्षमता पर एक बड़ी सवालिया निशान लगाता है। ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) में दिक्कतें, ठेकेदारों का खराब प्रदर्शन और पैसों की कमी जैसी समस्याएं इन विशाल प्रोजेक्ट्स को सालों से रोके हुए हैं। नतीजतन, अरबों डॉलर की लागत बढ़ गई है और देश के विकास की गति पर गहरा असर पड़ा है।
प्रोजेक्ट्स की बदहाली का अंबार
25 साल से ज़्यादा हो गए, लेकिन नॉर्थ-साउथ और ईस्ट-वेस्ट (NS-EW) कॉरिडोर्स के सात हिस्से अभी भी अधूरे हैं। ये प्रोजेक्ट श्रीनगर को कन्याकुमारी और सिलचर को सौराष्ट्र से जोड़ने वाले थे। ये कुल मिलाकर लगभग 140 किलोमीटर के थे, जो असम, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर में फैले हैं। यह तस्वीर देश के बाकी प्रोजेक्ट्स की भी है। जनवरी 2024 तक, 1,821 सेंट्रल प्रोजेक्ट्स में से 780 प्रोजेक्ट्स में देरी चल रही थी। इससे करीब ₹4.8 लाख करोड़ का कॉस्ट ओवररन (Cost Overrun) हुआ, जो देश की GDP का 1.6% है।
इसी तरह, बैंगलोर-चेन्नई एक्सप्रेसवे पर काम ठेकेदारों की माली हालत खराब होने से रुक गया। वडोदरा-मुंबई और दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों में भी कॉन्ट्रैक्ट (Contract) खत्म हो गए हैं या उन्हें फोरक्लोज (Foreclose) कर दिया गया है। इसकी मुख्य वजहें ज़मीन अधिग्रहण में देरी, फाइनेंशियल क्लोजर (Financial Closure) न होना और एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस (Environmental Clearance) मिलने में परेशानी रही हैं।
दशकों की देरी और बढ़ता खर्च
NS-EW कॉरिडोर प्रोजेक्ट, जो NHDP (National Highways Development Project) फेज-II का अहम हिस्सा था, दिसंबर 2000 में अप्रूव हुआ था। NHDP के लिए शुरुआती डेडलाइन 2007 थी, जिसे बाद में 2009 कर दिया गया। लेकिन आज भी इसके बड़े हिस्से अधूरे हैं। यह विडंबना ही है कि भारत की सड़कें बनाने की गज़ब की क्षमता है, जिसने गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स भी बनाए हैं, लेकिन ये प्रोजेक्ट दशकों से अटके हैं। जनवरी 2024 तक, सेंट्रल प्रोजेक्ट्स में 42.83% देरी हुई, हालाँकि यह आंकड़ा पहले से थोड़ा कम है। लेकिन कुल कॉस्ट ओवररन (Cost Overrun) बढ़ता ही जा रहा है। दिसंबर 2023 तक ही 431 बड़े प्रोजेक्ट्स में ₹4.82 लाख करोड़ से ज़्यादा का अतिरिक्त खर्च आया। कुल मिलाकर, 40% से ज़्यादा बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही है, जिससे सेक्टर में ₹5 लाख करोड़ का कॉस्ट ओवररन (Cost Overrun) हुआ है।
जड़ में हैं ये समस्याएं: ज़मीन, ठेकेदार और कॉन्ट्रैक्ट
इन लगातार देरी के पीछे कई बड़ी और गहरी वजहें हैं। सबसे बड़ी समस्या ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) की है, जिससे लागत में भारी बढ़ोतरी होती है और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (Private Investment) रुक जाता है। 35% सेंट्रल प्रोजेक्ट्स के अटकने की सीधी वजह यही है। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) के पुराने कॉन्ट्रैक्ट (Contract) भी नए नियमों और प्रोजेक्ट्स की जटिलताओं के हिसाब से नहीं हैं, जो इन मुश्किलों को बढ़ाते हैं। इसके अलावा, ठेकेदारों का प्रदर्शन खराब होना, उनकी माली हालत खराब होना और कॉन्ट्रैक्ट (Contract) को लेकर विवाद भी प्रोजेक्ट्स को रोकने और खत्म करने की आम वजहें हैं। कई बार तो ठेकेदार खुद कॉन्ट्रैक्ट (Contract) खत्म करने की नोटिस देते हैं, क्योंकि उन्हें ज़मीन handover जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं मिलतीं। रेगुलेटरी (Regulatory) अड़चनें और एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस (Environmental Clearance) की प्रक्रियाएं भी इस समस्या को और बढ़ा देती हैं। इन सब वजहों से नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में एक बड़ा 'रिस्क प्रीमियम' जुड़ जाता है, जिससे यह बिना सरकारी गारंटी के मुश्किल हो जाता है।
आगे की राह: रफ्तार की उम्मीद या हकीकत?
सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर खूब पैसा खर्च कर रही है, जैसे कि भारतमाला प्रोजेक्ट। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती प्रोजेक्ट्स को सही ढंग से और समय पर पूरा करने की है। अगर वर्तमान स्थिति बनी रही, तो बजट 2026-27 में पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर (Public Capital Expenditure) ₹12 लाख करोड़ से ऊपर जाने के बावजूद, सिर्फ़ फंड जारी करने से काम नहीं चलेगा। ऑडिट रिपोर्ट लगातार बताती हैं कि कैसे लागत बढ़ने और देरी होने से इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का असल फायदा नहीं मिल पाता। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नियोजित प्रोजेक्ट्स को हकीकत में बदलने के लिए कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट (Contract Management), ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया और रेगुलेटरी (Regulatory) ओवरसाइट में कितने बड़े सुधार किए जाते हैं, ताकि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के पूरे आर्थिक फायदे को हासिल किया जा सके।